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________________ उपशमनाकरण ] [ २९५ पर नाम और गोत्र इन दो कर्मों का स्थितिबंध संख्यात वर्ष का होता है। किन्तु वेदनीय कर्म का स्थितिबंध अभी भी असंख्यात वर्ष का ही होता है । इस स्थितिबंध के पूर्ण होने पर वेदनीय का अन्य दूसरा स्थितिबंध संख्यात वर्ष का होने लगता है और ऐसा होने पर वहां से आगे सभी कर्मों का स्थितिबंध संख्यात वर्ष का ही होता है। किन्तु पूर्व पूर्व स्थितिबंध स आगे हान वाला नपान नवीन स्थितिबंध असंख्यात गुणहीन होता है। तत्पश्चात् सहस्रों स्थितिबंधों के पूर्ण होने पर सातों ही नोकषायें उपशांत हो जाती हैं। लेकिन विशेषता यह है कि - छस्सुवसमिज्जमाणे, सेक्का उदयठिई पुरिससेसा। . समऊणावलिगदुगे, बद्धा वि य तावदद्धाए॥४७॥ शब्दार्थ – छस्सुवसमिज्जमाणे – छह (नोकषायों) के उपशमित होने पर, सेक्का - एक, उदयठिई – उदयस्थिति, पुरिस – पुरुष वेद की, सेसा - शेष, समऊणावलिगदुगे – एक समय कम दो आवलिका में, बद्धा वि – बंधे हुए भी, य - और, तावदद्धाए – उस काल में। गाथार्थ – छह नोकषायों के उपशान्त होने पर पुरुषवेद की एक उदय स्थिति शेष रहती है। उतने काल में समयोन दो आवलिका में बांधे हुये दलिकों को उपशमाता है। विशेषार्थ - छह नोकषायों के उपशम्य होने पर अर्थात् जिस समय छह नोकषाय उपशांत हो जाती हैं, उस समय पुरुषवेद की प्रथम स्थिति में समय मात्र प्रमाण वाली एक उदय स्थिति शेष रहती है। उस समय पुरुषवेद का स्थितिबंध सोलह वर्ष का होता हे और संज्वलन कषायों का स्थितिबंध संख्यात सहस्र वर्ष का होता है तथा पुरुषवेद की प्रथमस्थिति में दो आवलिका काल शेष रह जाने पर आगाल विच्छिन्न हो जाता है किन्तु उदीरणा होती रहती है। उस समय से लेकर छह नोकषायों के दलिक पुरुषवेद में नहीं संक्रमाता है, किन्तु संज्वलन कषायों में संक्रमाता है.। जब पहले कही हुई पुरुषवेद की एक भी उदयस्थिति व्यतीत होती है, तभी वह जीव अवेदक अर्थात् वेद के उदय से रहित हो जाता है। अवेदक काल के प्रथम समय में दो समय कम दो आवलिका काल के द्वारा बांधा हुआ जो दलिक है, केवल वही अनुपशांत रहता है, शेष सभी दलिक नपुंसकवेद में कहे गये प्रकार से उपशांत हो जाते हैं और दो समय कम दो आवलिका काल के द्वारा बंधा हुआ दलिक उतने ही अद्ध अर्थात् दो समय कम दो आवलिका प्रमाण काल के द्वारा उपशांत करता है। उसके उपशमन की विधि यह है कि १.पंचम षष्ठ ग्रंथ की टीका में तो जिस समय नोकषाय उपशम होती हैं उसी समय पुरुषवेद के उदय बंधादि विच्छेद को प्राप्त होते हैं, यह उल्लेख है।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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