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________________ संक्रमकरण ] [ १०१ अपूर्वकरणादयोऽपूर्वकरणसंज्ञकरणवर्ति प्रभृतयोऽशुभप्रकृतीनामबध्यमानानां दलिकमसंख्येयगुणनया श्रेण्या बध्यमानासु प्रकृतिषु यत्प्रक्षिपन्ति स गुणसंक्रमः। इसलिये अनन्तानुबंधी कषाय चतुष्क मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व के क्षपण काल में अपूर्वकरण परिणाम से लेकर गुणसंक्रम प्रवर्तित होता है। इस प्रकार गुणसंक्रम का लक्षण जानना चाहिये। अब यथाप्रवृत्तसंक्रम' का प्रतिपादन करते हैं। 'बंधे' इत्यादि अर्थात् ध्रुवबंधिनी प्रकृतियों का बंध होने पर यथाप्रवृत्तसंक्रम प्रवर्तित होता है तथा परित्तिओ व इसमें परित्ति पद के द्वारा परावर्तमान प्रकृतियां कही गई हैं, उनका अबंध होने पर भी और बंध होने पर भी यथाप्रवृत्तसंक्रम होता है। इसका आशय यह है कि सभी संसारस्थ जीवों के ध्रुवबंधिनी प्रकृतियों के बंध होने पर और परावर्तमान प्रकृतियों में से अपने अपने भव के बंध योग्य प्रकृतियों का बंध होने पर और बंध नहीं होने पर भी यथाप्रवृत्तसंक्रम होता है। इस प्रकार यथाप्रवृत्तसंक्रम का लक्षण जानना चाहिये। अब इन पूर्वोक्त उद्वलनासंक्रम, विध्यातसंक्रम गुणसंक्रम और यथाप्रवृत्तसंक्रम के द्वारा अपहार काल के अल्पबहुत्त्व का कथन करते हैं - थोवोवहारकालो, गुणसंकमणेणऽसंखगुणणाए। सेसस्स अहापवत्ते, विज्झाए उव्वलणनामे॥७०॥ शब्दार्थ – थोवोवहारकालो – अपहारकाल स्तोक (अल्प), गुणसंकमणेण – गुणसंक्रम के द्वारा, असंखगुणणाए - असंख्यातगुणा, सेसस्स – शेष का, अहापवत्ते – यथाप्रवत्त, विज्झाए - विध्यात, उव्वलणनामे - उद्वलना नामक संक्रम का। १. क्षपणकाल में यह पद विशेष आशय का बोधक है कि अनन्तानुबंधीचतुष्क मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन छह प्रकृतियों का गुणसंक्रम क्षपणकाल में ही होता है। क्योंकि गुणवृद्धि से आरोहण करने वाला जीव अनेक बार भिन्न-भिन्न अपूर्वकरण करता है। किन्तु प्रत्येक अपूर्वकरण में गुणसंक्रम हो ऐसा कोई नियम नहीं है। यथा मिथ्यात्व गुणस्थान में सम्यक्त्व प्रत्ययिक अपूर्वकरण में गुणसंक्रम नहीं होता है तथा उपशमना करणाधिकार में बताया है कि उपशम सम्यक्त्व और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व प्राप्त करते समय जो अपूर्वकरण करना पड़ता है, उसमें इन छह प्रकृतियों का गुणसंक्रम नहीं होता है। २. योग की प्रवृत्ति के अनुसार हीनाधिक दलिकों के संक्रमण होने को यथाप्रवृत्तसंक्रम कहते हैं। ३. सर्वसंक्रम की विवक्षा नहीं करने का कारण यह है कि उसका विषयी एक समय में संक्रान्त होने वाला अन्तिम खंड का दलिक है और उसका संक्रम हो जाने के बाद कोई भी दलिक शेष नहीं रहता है।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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