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________________ १०० ] [ कर्मप्रकृति गुणसंकमो अबझं-तिगाण असुभाण पुव्वकरणाई। बंधे अहापवत्तो, परित्तिओ वा अबंधे वि॥६९॥ शब्दार्थ – गुणसंकमो – गुणसंक्रम, अवझंतिगाण - अबध्यमान, असुभाण - अशुभ प्रकृतियों का, अपुव्वकरणाई - अपूर्वकरणादि में, बंधे – बंध होने पर, अहापवत्तो - यथाप्रवृत्त संक्रम, परित्तिओ - परावर्तमान प्रकृतियों के, व – अथवा, अबंधेवि – अबंध होने पर भी। गाथार्थ – अपूर्वकरणादि में वर्तमान जीव अबध्यमान अशुभ प्रकृतियों के कर्मदलिक का गुणसंक्रम करता है। ध्रुवबंधिनी प्रकृतियों के बंध होने पर तथा परावर्तमान प्रकृतियों के बंध होने अथवा बंध नहीं होने पर यथाप्रवृत्तसंक्रम होता है। विशेषार्थ – अपूर्वकरण आदि परिणाम वाले जीव अबध्यमान अशुभ प्रकृति संबंधी कर्मदलिक को प्रति समय असंख्यात गुणित श्रेणी के द्वारा बध्यमान प्रकृतियों में प्रक्षेपण करते हैं, वह गुणसंक्रम कहलाता है। गुण से अर्थात् प्रति समय असंख्यात लक्षण वाले गुणाकार से जो कर्मदलिकों का संक्रम होता है, वह गुणसंक्रम है – गुणेन प्रतिसमयमसंख्येय लक्षणेन गुणकारेण संक्रमो गुणसंक्रमः। गुणसंक्रम के लक्षण का स्पष्टीकरण इस प्रकार है - मिथ्यात्व, आतप और नरकायु को छोड़कर मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में बंधयोग्य तेरह प्रकृतियों का, अनंतानुबंधी कषायचतुष्क, तिर्यंचायु और उद्योत को छोड़कर सास्वादन गुणस्थान में बंधने योग्य उन्नीस प्रकृतियों का क्योंकि मिथ्यात्व और अनन्तानुबंधी कषाय का अपूर्वकरण गुणस्थान के पूर्व ही अविरत सम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानवी जीव क्षपक होते हैं, आतप और उद्योत ये दोनों ही शुभ प्रकृतियां हैं। शुभ प्रकृति में अशुभ प्रकृतियों का गुणसंक्रम होता है। आयुकर्मों का परप्रकृति में संक्रम नहीं होता है, इसलिये मिथ्यात्व आदि प्रकृतियों को यहाँ पर छोड़ने का कथन किया है तथा अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, कषायाष्टक, अस्थिर, अशुभ, अयश:कीर्ति, शोक, अरति और असातावेदनीय इन सब छियालीस अबध्यमान अशुभ प्रकृतियों का अपूर्वकरण गुणस्थान से गुणसंक्रम प्रारम्भ होता है। निद्राद्विक, उपघात, अशुभवर्णादिनवक, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा इन प्रकृतियों का अपूर्वकरण गुणस्थान में अपने अपने बंधविच्छेद से लेकर गुणसंक्रम जानना चाहिये। गुणसंक्रम के स्वरूप का अपर (दूसरा, अन्य) अर्थ इस प्रकार है – अपूर्वकरणादि अर्थात् अपूर्व करण संज्ञा वाले करणपरिणामवर्ती आदि जीव अबध्यमान अशुभ प्रकृतियों के दलिक को असंख्यात गुणित श्रेणी के द्वारा बध्यमान प्रकृतियों में जो प्रक्षेपण करते हैं, वह गुणसंक्रम है – .
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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