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________________ ८८ 1 शब्दार्थ हेट्ठओ जाव । सेसाण सुहुम हय - संतकम्मिगो तस्स बंधइ ताव एगिं - दिओ व णेगिंदिओ वावि ॥ ५९ ॥ - अंतरकरणा उवरि अंतरकरण से ऊपर (आगे), जहन्नठिइसंकमो जघन्य और, जस्स जिस प्रकृति का, जहिं – जहां, घाईणं - घाति प्रकृतियों का, निय - स्थिति संक्रम, उ - अपने चरमरसखंडे अन्तिम रसखंड को, दिट्ठिमोहदुगे – दर्शनमोहद्विक का। ― जब तक संक्रम होता है, ताव - संयोजना (अनन्तानुबंधी) य - — [ कर्मप्रकृति आऊण - आयुकर्म की, जहण्णठिई – जघन्य स्थिति, बंधिय - बांधकर, जावत्थि संकमोतब तक, उव्वलण - उद्वलनयोग्य, तित्थ – तीर्थंकर नाम, संजोयणा और, पढमालियं - प्रथम आवलिका, गंतुं - बीत जाने पर । - - - - - सेसाण – शेष प्रकृतियों का, सुहुम – सूक्ष्म, हयसंतकम्मिगो - कर्मों की बहुत सी अनुभागसत्ता का घात करने वाला, तस्स – उसके, हेट्ठओ अधस्तन, जाव तक, बंधइ – बांधता, ताव तब तक, एगिंदिओ - एकेन्द्रिय, णेगिंदिओ – अनेक इन्द्रिय वाले (द्वीन्द्रिय आदि), वावि अथवा । गाथार्थ अन्तरकरण से ऊपर घातिकर्मों की जिस प्रकृति का जहां पर जघन्य स्थितिसंक्रम होता है, वहीं पर उसका जघन्य अनुभागसंक्रम भी होता है तथा दर्शनमोहद्विक (सम्यक्त्व और मिश्रमोहनीय) का अपने-अपने चरम रसखंड के संक्रमण के समय जघन्य अनुभाग का संक्रम होता है। - - आयुकर्म की जघन्य स्थिति को बांधकर जब तक संक्रम संभव है, तब तक जघन्य अनुभागसंक्रम होता है। उद्वलन योग्य प्रकृतियों का, तीर्थंकर नाम का और संयोजना प्रकृतियों का प्रथम आवलिका का अतिक्रमण होने पर जघन्य अनुभागसंक्रम होता है। शेष प्रकृतियों का कर्मों की बहुत सी अनुभाग सत्ता का नाश करने वाला सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव अपने से अधस्तन अनुभाग को तब तक बांधता है, जब तक उसी भव में या अन्य द्वीन्द्रियादि भव में रहता हुआ अधिक अनुभाग को नहीं बांधता है तब तक वह उन प्रकृतियों के जघन्य अनुभाग का संक्रम करता है। विशेषार्थ अन्तरकरण से ऊपर (आगे) घातिकर्मों की प्रकृतियों में से जिस प्रकृति का जिस गुणस्थान में जघन्य स्थितिसंक्रम कहा है, उस प्रकृति का वहां पर जघन्य अनुभागसंक्रम भी जानना चाहिये। इसका तात्पर्य यह हुआ अन्तरकरण करने पर अनिवृत्तिबादरसंपराय क्षपक क्रम से जघन्य स्थिति के संक्रमकाल में जघन्य अनुभागसंक्रम को करता है । ज्ञानावरणपंचक, अन्तरायपंचक, चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवलदर्शनावरण, निद्रा और प्रचलारूप दर्शनावरणषट्क इन सोलह प्रकृतियों का क्षीणकषाय
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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