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________________ बंधनकरण उनका प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य है। उससे समचतुरससंस्थान का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है और उससे भी हुंडसंस्थान का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है। अंगोपांगनामकर्म के उत्कृष्ट पद में आहारकअंगोपांगनामकर्म का प्रदेशाग्र सबसे कम है, उससे वैक्रियअंगोपांगनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे भी औदारिकअंगोपांगनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है। संहनननामकर्म में आदि के पांच संहननों का उत्कृष्ट पद में प्रदेशाग्र सबसे कम है, किन्तु स्वस्थान में उनका प्रदेशाग्र परस्पर समान है, उससे सेवार्तसंहनन का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है। वर्णनामकर्म में कृष्णवर्ण का उत्कृष्ट पद में प्रदेशाग्र सब से कम है, उससे नीलवर्ण का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे लोहितवर्ण का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे हारिद्रवर्ण का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे शुक्लवर्ण का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है । . गंधनामकर्म में सुरभिगंध का उत्कृष्ट पद में प्रदेशाग्र सब से कम है, उससे दुरभिगंध का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है। रसनामकर्म में कटुकरसनामकर्म का उत्कृष्ट पद में प्रदेशाग्न सबसे कम है, उससे तिक्तरसनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे कषायरसनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे आम्लरसनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है और उससे मधुररस का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है। स्पर्शनामकर्म में कर्कश और गुरु स्पर्श नामकर्म का उत्कृष्ट पद में प्रदेशाग्र सबसे कम है, किन्तु स्वस्थान में दोनों का ही प्रदेथान परस्पर समान है, उनसे मृदु और लघु स्पर्श नामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, किन्तु स्वस्थान में दोनों का परस्पर तुल्य है, उनसे रूक्ष और शीत स्पर्श नामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, किन्तु स्वस्थान में तो उन दोनों का भी प्रदेशाग्र परस्पर समान है, उनसे भी स्निग्ध और उष्ण स्पर्श नामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, किन्तु स्वस्थान में तो इन दोनों का प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य है । आनुपूर्वीनामकर्म में देवगति और नरकगति आनुपूर्वी का प्रदेशाग्र उत्कृष्ट पद में सबसे कम है, किन्तु स्वस्थान में तो दोनों का परस्पर समान है। उससे मनुष्यगत्यानुपूर्वी का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है, उससे तिर्यंचगत्यानुपूर्वी का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है । वसनामकर्म का उत्कृष्ट पद में प्रदेशाग्र सबसे कम है, उससे स्थावरनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है । पर्याप्तनामकर्म का प्रदेशाग्र सबसे कम है और उससे अपर्याप्तनामकर्म का प्रदेशाग्र विशेषाधिक है । इसी प्रकार स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग-दुर्भग, आदेय-अनादेय, सूक्ष्म-बादर और प्रत्येक-साधारण नामकर्म के प्रदेशाग्र का कथन करना चाहिये ।
SR No.032437
Book TitleKarm Prakruti Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year1982
Total Pages362
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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