SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 101
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ वासनाको रोकनेके लिए व श्रद्धापूर्वक जिनवचनकी प्रभावना हेतु यह अनुप्रेक्षाग्रंथ बनाया है - यह इस ग्रंथके अन्त्यमंगल पढ़ने पर लगता है। જયદેવ आचार्य कार्तिकेयस्वामी जंगलमें शास्त्र लिख रहे हैं कई इतिहासविदोंका शिलालेखोंके आधारसे यह भी मन्तव्य है, कि उक्त नं. १ में बताए आचार्यकुमारनंदि और कोई नहीं, पर आप ही थे । आपने ही मथुराके सारस्वतआन्दोलनमें ग्रन्थ निर्माणका कार्य किया था। इस परसे इतना तो अनुमान किया जा सकता है, कि आप एक प्रतिभाशाली, आगम- पारगामी व अपने समयके प्रसिद्ध आचार्य थे। इन सब मन्तव्योंका एकीकरण करके एकत्व करना यद्यपि मुश्किल है, फिर भी शिलालेखों व आगमाधारोंसे इतना तो स्पष्ट होता है, कि आप महा वैराग्यवंत, आगमके महाज्ञाता थे, व आपकी अन्तर परिणतिमें इतनी प्रचुर विशुद्धता थी, कि महा उपसर्गको भी निज आत्माकी मस्तीमें नहींवत् सहज वेदते थे । आपकी एक मात्र 'कार्तिकेयानुप्रेक्षा' कृति प्रसिद्ध है, जो वैराग्यकी जननी है। आपका समय इतिहासविदोंने इसुकी द्वितीय शताब्दीका मध्यपाद निर्णित किया है। आचार्यदेव कार्तिकेयस्वामीको कोटि कोटि वंदन । (84)
SR No.032436
Book TitleBhagwan Mahavir Ki Acharya Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
PublisherDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
Publication Year2013
Total Pages242
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size35 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy