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________________ श. १३ : उ. १ : सू. ३,४ भगवती सूत्र नो-इन्द्रिय-उपयुक्त उपपन्न होते हैं? ३५. कितने मन-योग वाले उपपन्न होते हैं? ३६. कितने वचन-योग वाले उपपन्न होते हैं? ३७. कितने काय-योग वाले उपपन्न होते हैं? ३८. कितने साकार-उपयोग वाले उपपन्न होते हैं? ३९. कितने अनाकार-उपयोग वाले उपपन्न होते हैं? गौतम! इस रत्नप्रभा-पृथ्वी के तीस लाख नरकावासों में से संख्येय विस्तार वाले नरकों में १. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय नैरयिक उपपन्न होते हैं। २. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय कापोत-लेश्या वाले उपपन्न होते हैं। ३. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन उत्कृष्टतः संख्येय कृष्णपाक्षिक उपपन्न होते हैं। ४-१४. इसी प्रकार शुक्लपाक्षिक भी, इसी प्रकार संज्ञी, असंज्ञी, भव-सिद्धिक, अभव-सिद्धिक, आभिनिबोधिक-ज्ञानी, श्रुत-ज्ञानी, अवधि-ज्ञानी, मति-अज्ञानी, श्रुत-अज्ञानी, विभंग-ज्ञानी की वक्तव्यता। १५. चक्षु-दर्शनी उपपन्न नहीं होते १६. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय अचक्षु-दर्शनी उपपन्न होते हैं। १७. इसी प्रकार अवधि-दर्शनी भी। १८-२१. इसी प्रकार आहार-संज्ञा-उपयुक्त यावत् परिग्रह-संज्ञा-उपयुक्त भी। २३. स्त्री-वेदक उपपन्न नहीं होते २३. पुरुष-वेदक उपपन्न नहीं होते। २४. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय नपुंसक-वेदक उपपन्न होते हैं। २५-२८. इसी प्रकार क्रोध-कषाय वाले यावत् लोभ-कषाय वाले उपपन्न होते हैं। २९-३३. श्रोत्रेन्द्रिय-उपयुक्त उपपन्न नहीं होते यावत् स्पर्शनेन्द्रिय-उपयुक्त उपपन्न नहीं होते। ३४. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन उत्कृष्टतः संख्येय नोइन्द्रिय-उपयुक्त उपपन्न होते हैं। ३५-३६ मन-योग वाले उपपन्न नहीं होते। इसी प्रकार वचन-योग वाले भी। ३७. जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय काय-योग वाले उपपन्न होते हैं। ३८-३९. इसी प्रकार साकार-उपयोग वाले भी, अनाकार-उपयोग वाले भी। संख्येय-विस्तृत नरकों में उद्वर्तन-पद ४. भंते! इस रत्नप्रभा-पृथ्वी के तीस लाख नरकावासों में से संख्येय-विस्तृत नरकों में कितने नैरयिक उद्वर्तन करते हैं? कितने कापोत-लेश्या वाले उद्वर्तन करते हैं यावत् कितने अनाकार-उपयोग वाले उद्वर्तन करते हैं? गौतम! इस रत्नप्रभा-पृथ्वी के तीस लाख नरकावासों में से संख्येय-विस्तृत नरकों में एक समय में जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय नैरयिक उद्वर्तन करते हैं। जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय कापोत-लेश्या वाले उद्वर्तन करते हैं। इसी प्रकार यावत् संज्ञी। असंज्ञी उद्वर्तन नहीं करते। जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय भवसिद्धिक उद्वर्तन करते हैं। इसी प्रकार यावत् श्रुत-अज्ञानी की वक्तव्यता। विभंग-ज्ञानी उद्वर्तन नहीं करते, चक्षुदर्शनी उद्वर्तन नहीं करते। जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः संख्येय अचक्षु-दर्शनी उद्वर्तन करते हैं। इसी प्रकार यावत् लोभ-कषाय वाले। श्रोत्रेन्द्रिय-उपयुक्त उद्वर्तन नहीं करते, इसी प्रकार यावत् स्पर्शनेन्द्रिय-उपयुक्त उद्वर्तन नहीं करते। जघन्यतः एक, दो अथवा तीन, उत्कृष्टतः नो-इन्द्रिय-उपयुक्त उद्वर्तन करते हैं। मन-योग वाले उद्वर्तन नहीं करते, ४९०
SR No.032417
Book TitleBhagwati Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakprabhashreeji, Mahendrakumar Muni, Dhananjaykumar Muni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2013
Total Pages590
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size15 MB
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