SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 106
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ९४ ५. ६. सूंदरी रे एक जांमण जणीयों, बाहुबल कला बोहीत्तर भणीयो । पछें सुनंदा री कूख न खुली काइ ।। ७. ८. भिक्षु वाङ्मय - खण्ड - १० व्राह्मी रें हूआ नीनांणू वीरा, जांमण जाया अमोलक हीरा । भरत चक्रवत्त नी पदवी पाइ ।। ९. चुतर बायां सीखी चोसठ कला, गुण ज्यांमें पडीया सगला । त्यांरी अकल में कमी नहीं काइ ।। बेहूं बायां हुई बतीस लखणी, अठारें लिप एक ब्राह्मी भणी । श्री आदि जिणेसर सीखाइ ।। एक सील रों स्वाद वस रह्यों मन में, कदे विषेंरी वात न तेवडी तन में । छांड दीधी ममता सुमता आइ ।। १०. बेहूं बेटी वीनवें बापजी आगें, मोंनें सील रो स्वाद वलभ लागें । म्हारी मत करजों कोइ सगाई || ११. म्हें तों नारी किणरी नही वाजां, म्हें तों सासरा रो नांम लेती लाजां । म्हारें पीतम री परवाह नही काइ ।। १२. बापजी बोल्या सुणों बेटी, थे तों मोह जाल ममता मेटी । थांरी करणी में कसर नही काइ ।। १३. भरत नही लेवण देवे दिख्या, ब्राह्मी सील तणी मांडी रिख्या । रूप देंखी भरत रें वंछा आइ ।। १४. सती बेलें बेलें पारणों कीनों, एक लूखों अन-पांणी में लीनों । फूल ज्यूं काया परी कुमलाइ ।। १५. भरत री विषें सूं जांणी मनसा, तिणसूं वांमी झाली तपसा । साठ हजार वरस री गिणती आइ ।।
SR No.032414
Book TitleAcharya Bhikshu Aakhyan Sahitya 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Ganadhipati, Mahapragya Acharya, Mahashraman Acharya, Sukhlal Muni, Kirtikumar Muni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2011
Total Pages464
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy