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आसन (१) 'संयमपूर्वक चलो, संयमपूर्वक खड़े रहो, संयमपूर्वक बैठो, संयमपूर्वक सोओ' यह निर्देश भावधारा की शुद्धि के लिए दिया गया है। शरीर की मुद्रा और भाव का गहरा संबंध है। शरीर जिस संस्थान में होता है, जिस मुद्रा में होता है, वैसा ही भाव बन जाता है।
आसन के दो प्रयोजन हैं, उनके आधार पर आसन के दो प्रकार होते हैं
१. ध्यानासन-ध्यान के लिए उपयुक्त आसन।
२. आरोग्यवर्धक आसन-स्वास्थ्य अथवा शरीर सिद्धि के लिए किए जाने वाले आसन।
आसन साधना का एक अपरिहार्य अंग है। आचार्य कुन्दकुन्द का अभिमत है कि जो व्यक्ति आहार-विजय, निद्राविजय और आसन-विजय को नहीं जानता, वह जिनशासन को नहीं जानता। आसन-विजय का अर्थ है-एक आसन में घंटों तक बैठने का अभ्यास कर लेना।
२६ अप्रैल २००६