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________________ प्रथम खण्ड : जीवनी खण्ड २१ | • पुन: कर्नाटक में हिन्दुपुर से आपका विहार पुन: कर्नाटक की ओर हुआ। यहाँ से पूज्यपाद कुडमलकुंटे, गोरी, बिदनूर आदि || छोटे-छोटे गांवों को अपनी पद रज से पावन करते हुए तोंडभावि पधारे। रविवार का दिन होने से बैंगलोर महानगर || के अनेक श्रावक-श्राविका पूज्य आचार्य भगवन्त की सेवा में उपस्थित हुए और बैंगलोर फरसने की विनति की। यहां से आप खम्भात सम्प्रदाय के २ सन्तों को मिलाकर ठाणा १२ से दौंड बालापुर पधारे। पूज्य कान्तिऋषि जी म.सा. आदि ठाणा ४ भी आगे-पीछे विहार करते हुए यहाँ तक साथ पधारे। यहाँ श्री मांगीलाल जी रुणवाल के नेतृत्व में मैसूर संघ ने उपस्थित होकर क्षेत्र स्पर्शन की विनति प्रस्तुत की। मद्रास, मंड्या, बैंगलोर, चिकबालपुर आदि | अनेक क्षेत्रों के श्रावक भी यहां उपस्थित थे। पूज्यपाद ने उपस्थित जन समुदाय को प्रेरणादायी सम्बोधन करते हुए फरमाया - "धन के लिये पुत्र, मित्र घर-द्वार एवं अपना देश-प्रदेश छोड़ने वाले व्यक्ति जिनशासन और धर्म के लिये त्याग को भारी मानें, । यह आश्चर्य की बात है।" आपकी पावन प्रेरणा से यहाँ कई भाई बहिनों ने कई नियम अंगीकार किये। ___यहाँ से विहार कर पूज्यवर्य राजनकूटे यलहंका, गंगेणहल्ली आदि गांवों में धर्मोद्योत करते हुए दिनांक २३ मार्च १९८० को दश ठाणा से कर्नाटक की राजधानी बैंगलोर के उपनगर यशवन्तपुर पधारे । यहाँ पधारने वाले आप स्थानकवासी परम्परा के प्रथम आचार्य थे। नगर-प्रवेश के अवसर पर बैंगलोर शहर के श्रावक-श्राविकाओं एवं अन्य ग्राम-नगरों से आए संघ-सदस्यों की विशाल जनमेदिनी के उल्लास एवं उमंग का दृश्य अद्भुत था। जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। यशवन्तपुर श्री संघ के साथ श्री मोतीलालजी कोठारी, श्री नौरतन जी नन्दावत, श्री सुगनमलजी गणेशमलजी भण्डारी आदि के परिवार प्रसन्नता से आप्लावित थे। वर्षों की भक्ति व पूर्वजों के संस्कारों से समृद्ध भण्डारी परिवार ने श्रद्धा-समर्पण के साथ भक्ति का परिचय दिया। आपके पावन सान्निध्य व मंगलमय उद्बोधन से प्रेरित होकर यहां २० युवा बन्धुओं ने सामायिक करने के नियम अंगीकार किए। यशवन्तपुर दो दिन विराज कर पूज्यप्रवर २५ मार्च को २५ जैनघरों की आबादी वाले मल्लेश्वरम् में पधारे। तदनन्तर आपका पावन पदार्पण श्रीरामपुर में संघ ऐक्य का सन्देश लेकर हुआ। आपके उद्बोधन से स्थानीय संघ में कलह कलुष दूर हुआ व सामरस्य का संचरण हुआ। यहाँ से पूज्यपाद बैंगलोर महानगर के हृदयस्थल चिकपेट पधारे। चिकपेट में लगभग ५००० जैन परिवार निवास करते हैं। यहाँ आप श्री ने २५० हस्तलिखित ग्रन्थों का अवलोकन कर प्राच्य ग्रंथों के प्रति अपनी अभिरुचि प्रकट की। चिकपेट में आपके विराजने से धर्म की लहर दौड़ गई। यहाँ के लालबाग ग्लास हाऊस में २९ मार्च को महावीर जयन्ती के पावन प्रसंग पर आयोजित प्रवचन सभा में हजारों श्रोता उपस्थित थे। इस अवसर पर पूज्यपाद के प्रवचन पीयूष से बैंगलोर सामायिक स्वाध्याय संघ की स्थापना हुई । बैंगलोर महानगर के लब्धप्रतिष्ठ समाजसेवी श्री फूलचन्दजी लूणिया एवं श्री भंवरलालजी गोटावत ने संकल्प लिया कि जब तक धर्मस्थान में सामायिक करने वालों की संख्या २०० तक नहीं पहुँचती है व १०० व्यक्ति स्वाध्यायी नहीं बन जाते हैं, वे मीठा नहीं खायेंगे। इसी अवसर पर कर्नाटक प्रान्तीय स्वाध्याय संघ की स्थापना, कर्नाटक प्रान्त में सामायिक स्वाध्याय का सन्देश पहुँचाने की ओर एक बड़ा कदम था। बैंगलोर नगर के सुज्ञ श्रावकगण श्री प्रकाशजी मास्टर, श्री पन्नालालजी चोरड़िया, श्री सोहनजी रेड़ व मुखियाद्वय श्री लूणिया जी व श्री गोटावत जी के संकल्प युक्त प्रयासों से स्वाध्याय की गति को बल मिला। आगामी अक्षयतृतीया वि.सं. २०३७ दिनांक १७ अप्रेल १९८० को प्रभावक आचार्य हस्ती के आचार्य पद)
SR No.032385
Book TitleNamo Purisavaragandh Hatthinam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDharmchand Jain and Others
PublisherAkhil Bharatiya Jain Ratna Hiteshi Shravak Sangh
Publication Year2003
Total Pages960
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size34 MB
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