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प्रज्ञा संचयन
उस वस्तु को न्याय-वैशेषिक सम्मत परिभाषा में न्यायाचार्य अक्षपाद ने भी स्पष्ट रूप से वर्णित की है। वह अपने सूत्र में संक्षेप से कहते हैं कि मिथ्यादर्शन - अज्ञान से दोष - रागद्वेष जन्म लेते हैं और रागद्वेष से मानसिक - वाचिक - कायिक व्यापार (जैन परिभाषा अनुसार 'योग') चलता है जिसके कारण से पुनर्जन्म और सुखदुःख का चक्र प्रवर्तित है जो जैन परिभाषा अनुसार 'बंध' कोटि में पड़ता है। सांख्य योग दर्शन उसी वस्तु को अपनी परिभाषा में रखते हुए कहता है कि अविवेक से - अज्ञान या मिथ्यादर्शन से राग-द्वेषादि क्लेश के द्वारा दुःख और पुनर्जन्म की परंपरा प्रवर्तित होती है। वेदान्त दर्शन भी यही वस्तु अविद्या और माया से अथवा अध्यास से वर्णित करता है। बौद्ध दर्शन में जो अविद्या संस्कार आदि बारह कड़ियों की श्रृंखला है, जो प्रतीत्य समुत्पाद के नाम से प्रसिद्ध है, वह जैनदर्शन सम्मत आस्रव बन्ध और न्याय-वैशेषिक सम्मत मिथ्यादर्शन, दोष आदि पांच कड़ियों की श्रृंखला और सांख्य-योग सम्मत अविवेक और संसार उसका ही विशेषरूप से विस्तार है। ___ जैन दर्शन के अनुसार जो संवर मोक्ष के उपाय के रूप में वर्णित है और उसके फलस्वरूप जो मोक्ष तत्त्व का निरूपण है उसे ही न्याय-वैशेषिक अनुक्रम से सम्यग्ज्ञान - तत्त्वज्ञान और अपवर्ग के नाम से वर्णित करता है, जब कि बौद्धदर्शन निर्वाणगामिनी प्रतिपदा-मार्ग के नाम से और निर्वाण के नाम से वर्णित करता है। बौद्ध दर्शन में अन्य दर्शनों की भाँति आत्मा, चेतन, ब्रह्म या पुरुष नाम से आत्मस्वरूप का जितना चाहिये उतना वर्णन नहीं है इसलिये बहुत से लोग उसे अनात्मवादी मान बैठते हैं, परन्तु वह भूल है। अनात्मवादी हो वह पुनर्जन्म या परलोक को न माने, जब कि बुद्ध ने पुनर्जन्म और उसके कारण एवं कर्म की निवृत्ति
और निर्वाण पर खास बल देकर चार आर्यसत्यों को अपनी विशिष्ट खोज बतलाया है: (१) दुःख; (२) उसका कारण तृष्णा; (३) निर्वाण; और उसका उपाय अष्टांगिक मार्ग - यही चार आर्यसत्य जैन परिभाषा में अनुक्रम से आस्रव, बंध, संवर एवं मोक्ष हैं, जब कि न्याय-वैशेषिक परिभाषा में अज्ञान, संसार, तत्त्वज्ञान
और अपवर्ग है, एवं सांख्य-योग परिभाषा में अविवेक, संसार, विवेक और मोक्ष है। इस प्रकार तुलना करते हुए सारे ही ब्राह्मण श्रमण दर्शन मुख्य वस्तु में एक मत हो जाने से श्रीमद् राजचंद्र ने कहा है कि -