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जैनधर्म की कहानियाँ भाग-६/३२ लिखते हुए भी कपकपी आ जाती है - वे दुःख महावीर के जीव ने अज्ञानवश
अन्तिम बार भोग लिये। बस अब फिर कभी वह जीव ऐसे दु:ख में नहीं पड़ेगा। नरक की यह उसकी अन्तिम पर्याय है; अब नरक को तिलांजली देकर वहाँ से बाहर निकलकर वह पुन: सिंह हुआ। उसकी यह सिंह पर्याय (और तिर्यंच पर्याय भी) अन्तिम है, अब फिर वह जीव कभी तिर्यंचगति में भी अवतरित नहीं होगा।
इसप्रकार महावीर के जीव ने नरक और तिर्यंच इन दोनों गतियों में परिभ्रमण करने का अन्त तो किया । अब शेष रही देव और मनुष्य पर्यायों का भी अन्त करके वह जीव अपूर्व सिद्धपद की साधना किसप्रकार करता है - उसकी सरस आनन्दप्रद कथा अब प्रारम्भ होगी। अभी तक तो वह जीव अज्ञान एवं कषायवश संसार में कहाँ-कहाँ भटका और कैसे-कैसे दुःख भोगे - यह उसकी कथा थी, बन्धन की कथा थी; परन्तु अब वह जीव किसप्रकार धर्म प्राप्त करता है, आराधक बनकर कैसी शान्ति का वेदन करता है और कैसे मोक्ष सुख साधकर महावीर बनता है, उसकी सुन्दर आनन्ददायक धर्मकथा पढ़कर प्रसन्नता होगी। दुःख में तो ग्लानि होती ही है; परन्तु दुःख की कथा पढ़कर भी जीव थक जाता है। महावीर के जीव की दुःखद कथा का अन्त हुआ; अब उसकी सुखद कथा प्रारम्भ करते हैं। भगवान महावीर के पूर्वभव : सम्यक्त्वोपरांत
दसवाँ पूर्वभव : सिंह के भव में सम्यक्त्व प्राप्ति अपने चरित्र नायक का जीव नरक से निकलकर एक बलवान सिंह हुआ। दसवें भव में जो तीर्थंकर होनेवाला है - ऐसा वह सिंह भरतक्षेत्र के एक पर्वत पर रहता था; वन के विशाल हाथी भी उससे डरते थे; उसके विकराल मुँह से भयानक गर्जना सुनकर वन के पशु काँप उठते थे। क्रूरता से हिंसा करते-करते उसे दीर्घकाल व्यतीत हो गया था। एकबार अमितकीर्ति और अमितप्रभ नाम के दो मुनिवर
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