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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली , . . . [a ॥ ढाल १७ सतरमी॥ ... ॥ वहिली नवलण करजो इण ढशमें रे ए देशी॥ मुझ ने हो दरसण न्याय न तु दिये हो, नवली छे मुझ रीत । जे सुं हो तुमसे निशदिन रूसणो हो, म्हारे तिण सुप्रीत ॥मु० ॥१॥जेहने ते वनयासी दीयो हूं तो हो. धरतो नवि विश्वास। तेहने हो आदरसुं तेडायने हो, में राख्यो ले पास ॥ मु०॥२॥ जिणसु हो कांइं मिटन मेलतोरे, करतो कुरूप सदीव में तिणसु एकारो मांडियाहो, लागो म्हारो जीव ॥ मु०॥३॥ वयण न लोपे तुं पिण जेहनोरे, काम कहुँ पिण. तेह । न्हाक नमन पिण न करूं तेह ने हो, परित अछे मुझ होय ॥ मु०॥४॥ मुझ करणी सामु नवि जोइये हो, वीरसेन जिनराज । पर दुःख काटण विरूद विचारने हो, दरसण दो जिनराज ॥ मु०॥५॥.... || ढाल १८ अडारमी॥ ॥ वेग पधारो हो रंगलथी ए देशी ॥ सै मुख साहिबने मिया ॥. फेर पड़े न
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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