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________________ ६२] . . . . श्री प्राचीनस्तवनावली करे नहीं स्वाम । ते जिनराज निवाजियोजी, आपणो अवसर पाम ॥ ने०॥६॥ ॥ ढाल १६ सोलमी॥ ॥ परतिख पास अमिझरो ए देशी॥ ईश्वर जिन वैरागीयो, रागीथी अधिक कदि वाजेरे । जिनपरि प्रभु वखाणीये, ते परि सगली तुझ छाजेरे ॥ ई० ॥१॥ तु क्रोधी क्रोधे चढयो, अरियणना कंद निकंदेरे। अभिमानी सिर सेहरो, तुं चाले आपणी छंदेरे ॥ ई० ॥२॥ मायावी माया रची, सह को नाम न वंचेरे । तुं लोभी गुण में लही, लाखे ज्ञाने ले संचेरे ॥ ई०॥३॥ सेवक पिण पोता तणो, तु जोव निजर न देईरे । देइ कान न साँभले, किणहीनी वात कदेईरे ॥ ई० ॥४॥ अलख अगोचर तुं जयो, किणहि तुझ अंत न पायोरे। भगत वच्छल जिनराजियो, पिण जिनराज कहायोरो॥ ई० ॥५॥
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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