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________________ श्री प्राचीनस्तननावली. [at ॥ स्वा० ॥ ३ ॥ दो जिहो पिण तुं नहीं, न धरे विष लवलेस ॥ अमिय समाणे बोलड़े, दे सहुने उपदेश ॥ स्वा० ॥ ४ ॥ अथवा नाम भुंजगमें, साच कहे कवीराज ॥ अवर सहु सर्प लोटिया, तुं मणिधर महाराज ॥ स्वा० ॥ ५ ॥ ॥ ढाल १५ पंदरमी ॥ ॥ वीर वरवाणी राणी चेलणाजी ए देशी ॥ नेम प्रभु माहरी विनतिजी, साँभलो धर्म धूरीण । फेरवो तुझ विचे तेहवोजी, को नहीं जाण प्रवीण ॥ नेम० ॥ १ ॥ हुं प्रभु दास तुं मुझ धणीजी, आपणे सगपण एह ते भणी स्युं कहि दाखवुंजी, जगति जाणो करो तेह ॥ नेम० ॥ २ ॥ भगति तुझ अवर धारा तरेजी ॥ आसण अपूजता जाय ॥ आपवि मासीने जोइजोजी, लाभ तो केह न थाय ॥ ने० ॥ ३ ॥ प्रारथया पहिडे नहींजी उत्तम एह आरा निपट उवेखा मूके नहींजी, नेटकाई करे सार ॥ ने० ॥ ४ ॥ आपणे उत्तरे जिहां रहेजी, अवर ६
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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