SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 77
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६२] . . . . ... श्री प्राचीनस्तवनावली पामीजी ॥ २॥ भव भ्रम धर्म समाबन जलधरो, भूमि चेतन शुभ कारीजी। समकित बीजे फूल्यो तरुवर, उत्तर गुण दलसारीजी अनुभव ज्ञानामृत फल उत्तम, भविजन हर्ष वधाईजी ॥ जिनप्रवचन निज रमणे रमतां, चेतनता प्रगटाइजी ॥ ३ ॥ जिनवर आनन पंकज कोशे, विकशित नित्य निवासीजी । अनुपम रूप लावण्य शिरोमणि, सकल कळा सुविलासीजी ॥ सुमति आपे भारती देवी, ज्ञान ध्यान सुख कंदोजी । नव निधि वाचक चारित्र नंदी, पामे परम आनंदोजी ॥ ४॥ ॥ पंचमीनी थुई ॥ पुरी पुंडीरकणी समवसरणगत, भाषे श्री जिनरायाजी । सूरसेन नरपति उपदेशे, पंचमी तप बतलायाजी ॥ चउविहार व्रत मुनि मुख करिये, ज्ञान भक्ति वली कीजेजी । एह उपदेशक सीमंधरजिन, पंचमी तिथि प्रणमीजेजी ॥१॥ आश्रव पंच अवरोधन करके, पंच संवर गुण
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy