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________________ ६०] . . . . श्री प्राचीन स्तवनावली सद्भक्त्यापदकमल्योः श्री गुरुजिन ॥ “ यशः सूरिमा वितरतु सदासोऽतुल सुखं” ॥ १ ॥ मरुदेश श्री योधपुर नगर स्थामल विसौ-सवाल ज्ञातीये जति सुशमिनो यस्य जननं॥ समे संवचक्षु विधुखगविधौ श्री गुरुजिन ॥ यशः ॥२॥ मुदायस्याख्यांजेठमल इतितत्मातृजनका । वकार्दा यो बाल्येप्यजनि कुशलोहत्प्रगदिते। क्रियाद्यानुष्टाने खरतरतपः श्री गुरुजिन ॥ यश० ॥३॥ समीपाद्यो श्री मोहनमुनि गुरोधर्मममलं । निशम्योच्चैः शिष्यो जनि गगनदिशां केंदु समये । गृही वादीक्षांयोधपुर नगरे श्री गुरुजिन ॥ यशः० ॥४॥ सदागुर्वाज्ञाष्ट प्रवचनजनी पालन परो । गुणैः कांतोमूलोत्तर गुणरूचि,श्रीमुखात् । क्रमाजातोयः श्री जिन समयवित् श्री गुरुजिन ॥ यशः० ॥५॥ विधाप्यास्मैयौगोद्वहन कमदापभिशरनंद चन्द्राब्दे पंन्यास पदममलंराजनगरे । समीपात्पूज्यैः पंपदधर मुनेः श्री गुरुजिन ॥ यशः०॥६॥ अभूद्यस्याब्दे नंदरस खगको सूरि पदवी। हिमसूदावादे
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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