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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [२७ निस्तार ॥मि०॥६॥ पांचसे साधु अढिशे साध्वी, ले साथे परिवार । समेतशिखरे जिनवर चालिया, सुमति गुपति सुविचार ॥ मि०॥७॥ ॥ ढाल ५ मी॥ ॥आज हो पट मारा थपायो ॥ ए देशी ॥ मल्लि हो समेतसिखर सिधाया, गिरिवर देखी बहु सुख पाया ॥ सघला साधारे मन भाया । छोड़ी सकल संसारनी माया ॥ म०॥१॥ पुढवी पद पर पंकज लीधा, साधारा मन वंछित सीधा। डाभ संथारेसु मन दीधा॥धर्म शुक्ल ध्यानसाथे लीधा ॥ म०॥२॥ चौरीशी लक्ष जीव खमाया, पाप अढारे दूर गमाया। सिद्ध वधु मिलवा उमाया। पडिलेहि छोड़ी निज काया ॥ म०॥३॥ साधवी अंतर परषदा रहिये, वारह परषदा साधुनीकहिये, काउसग्ग करीने काया दहिये ॥ सिद्ध ध्यानसुं शिवपद लहिये ॥म०॥४॥ ऋतु वसंत फागुण सुखदाई, शुक्लपक्ष बारस अतिसाई । अर्धनिशि
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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