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श्री प्राचीनस्तवनावली
जब भ्ररमी आई। तब महिजिन मुक्ति सिरिपाई ॥ ० ॥ ५ ॥ अविन्यासी अधिकार कहाई । परमय यतेन्द्र सुख कहिये । समाध्यान सरबंग सहाई । परम रस सर्व सोहाई ॥ मु० ॥ ६ ॥ सिद्ध बुद्ध अविरुद्ध ए कहिये, आदि न कोई एहनो लहिये ॥ जिन वचने कर सर दहिये ॥ अनुपम भावमां सदाही रहिये ॥ म० ॥ ७ ॥
॥ कलश ॥
संवत सतरेसे छप्पने आसुमास उदारए । प्रतिपदा तिथि शुक्लपक्षे, जेसलमेर मझारए ॥ प्रधान पाठक श्रीकुशलधीरे, गुरुजी सानिद्ध करी । ए स्तवन कीधा कुशल लाभे, धर्म राग मनमे धरी ॥
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॥ श्री पार्श्वनाथ स्वामीको सत्तर दालियो ।
पुरिसादाणी परगड़ो, जेसलमेर जिणंद । पंचकल्याणक जेहना पूजीश परमानंद ॥ १ ॥ जिनवरना गुण गावता, लहिये समकित सार ।