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________________ २८ ] श्री प्राचीनस्तवनावली जब भ्ररमी आई। तब महिजिन मुक्ति सिरिपाई ॥ ० ॥ ५ ॥ अविन्यासी अधिकार कहाई । परमय यतेन्द्र सुख कहिये । समाध्यान सरबंग सहाई । परम रस सर्व सोहाई ॥ मु० ॥ ६ ॥ सिद्ध बुद्ध अविरुद्ध ए कहिये, आदि न कोई एहनो लहिये ॥ जिन वचने कर सर दहिये ॥ अनुपम भावमां सदाही रहिये ॥ म० ॥ ७ ॥ ॥ कलश ॥ संवत सतरेसे छप्पने आसुमास उदारए । प्रतिपदा तिथि शुक्लपक्षे, जेसलमेर मझारए ॥ प्रधान पाठक श्रीकुशलधीरे, गुरुजी सानिद्ध करी । ए स्तवन कीधा कुशल लाभे, धर्म राग मनमे धरी ॥ ......... ॥ श्री पार्श्वनाथ स्वामीको सत्तर दालियो । पुरिसादाणी परगड़ो, जेसलमेर जिणंद । पंचकल्याणक जेहना पूजीश परमानंद ॥ १ ॥ जिनवरना गुण गावता, लहिये समकित सार ।
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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