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________________ wwwwwwwwwwwwwwwww ~~ श्री प्राचीनस्तवनावली ॥ ढाळ चौथी॥ श्री जिनपतिमा हो जिन सारखी कही॥ एदेशी॥ मिगशर सुदि इग्यारस आवीया, तीनसे नर ले साथ । तीनसोनारी हो वली लीधी दीक्षा, छोड़ी सहु घर आथ ॥ मि० ॥ १॥ तिण हिज दिन संध्या समय थया, लहियो केवल राज । ततखिण समवसरण देवे कांधो, सीधा सघला काज ॥ मि०॥२॥ परषदा बारे ही बैठी तिहां। सुणे धर्म धरि नेह ॥ तिण समे छए मित्र पिण आवीया, ले दीक्षा तजि नेह ॥ मि० ॥३॥ अट्ठावीशगणधर स्थापियाजिणवरे, साधु सहसचालीश। साध्वी सहस पचावन जेहने, करें धर्म विश्वावीश ॥ मि०॥४॥ सहस चौराशी एक लख श्रावक, श्रावकणी लख तीन ॥ सहस पेंसठ छे ऊपर जेहने, तप जप नी या रीत ॥ मि०॥५॥ सहस पचावन आयु पालीने, उपशम धरिय उदार ॥ पर उपकारी हो श्रीजिनवर तणो, नाम लियो
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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