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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली . .. .. . १९३ महर करी मुझ ऊपरे, गुरू पूर निजर निहालरे लाला। राज हरख कर जोडने, गुरू वंदे चरण त्रिकालरे लाला ॥श्री० ॥ ९॥ ___ आयो आयोरी समरता दादोजी आयो । संकट देख सेवक कुं सद्गुरू देरावरत्ये थायोरी। समरता० ॥१॥ वर्षे मेहने रात अंधेरी, वाउफेण सवलो वायो। पंच नदी हमे बैठे बेडी दरिये चित्त डरायो ॥ समरता० ॥ २॥ उच्च भणी पहुंचावण आयो, खरतर संघ सवायो । समयसुन्दर कहे कुशल कुशल गुरू, परमानंद सुख पायोरी ॥ समरता० ॥३॥ ॥ स्तवन १ लुं॥ ॥ राग प्रभाती ॥ उठोने मोरा आतमराम-ए देशी ॥ सिद्धगिरि ध्यावो विमल जावो, कंचनगिरि वेलां वधावोरे ॥ सिद्ध०॥ए आँकणी ॥ इण गिर वरियारी महिमा मोटी, कहतां न लागे खोटीरे।
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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