SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 117
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०२] . . . . . श्री प्राचीनस्तवनावली ॥जंबु कुअरकी सिज्झाय ॥ जंबु कयो मानलेरे जाया, मत ले संजम भार ॥ ए आठोइ कामणीरे जंबु, अप्सरारे उणि यार । परणाने काइ परिहरोरे, यांरो किम निकलेरे जमार ॥ जं० ॥१॥ ए आठोइ कामणीरे जंबु, तुझ विण विलखी थाय । रवि आथमीये किम सरे यारों, वदनमुखी कमलाय ॥जं॥२॥ मन हीना छे मानवी माता, मन मन ने भरपूर । रूपे रमणी जो रमे माता, जस दुरगति छे नहीं दूर ॥ माता० ॥३॥ पाली पोसी मोटो कियोरे जाया, इम किम दे छटकाय । माता पिता झूरे घणा थारे, दया नहीं दिलमाय ॥ जं० ॥ ४॥ छिन्नु क्रोड़ सोनैया हुंताजी, श्री श्रीभंडार मांय, नन्याणु कोडनो दायजोरे जाया, धन आवे छे आज॥जं० ॥५॥ एक लोटो पाणी पीयो माता, मात पिता छे अनेक । सघलारी दया पालसु माता, आप
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy