________________
श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [१०१ हो पिऊ, प्रत्यक्ष सुख छे एह छोड्या से पछतावसो हो पिऊ, करसणीज्युं चूके मेह ॥ पिऊ० ॥२३॥ में तो कांइ चूका नहीं ए प्यारी, तुम चूकाप्रत्यक्ष । सुख छे थोड़ा कालनो ए प्यारी, पीछे मारसी जक्षाप्यारी०॥२४॥म्हेतो जाणाछां आपने हो वि० लालच लागो छे जेह । मोक्ष नारी नहीं दीपती हो पिऊ, मोक्ष छे म्हारी देह ॥ पिऊ०, ॥२५॥ मलमूत्रनी थारी देहड़ी है प्यारी, मोक्ष छे सिद्ध स्वरूप । इतरा दिन भोले रह्यो ए प्यारी, में जाण्यो अंध कप ॥ प्यारी०॥२६॥ एम कही धन्नो चालियोरे धर्मी, आयो प्रभु के पास । संजम लहीने सीखवे धर्मि, नित करे अंग सिझाय ॥ " शिरोमणि साधुजी, कहेवाणा तपसी सार” ॥ ॥२७॥ अणसण कर अनुतर गयाजी, वरत्या छे जय जयकार ॥ शिरोमणि ॥ समयसुन्दरजनिी विनतिजी, मान लीजो म्हाराज ॥ शिरो० ॥२८॥