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________________ ४६ ध्यानशतक अविद्या आदि क्लेशों के अंकुरित होने की सम्भावना नहीं रहती। इसीलिए क्षीणक्नेश को कुशल' व चरमदेह कहा गया है (चरमदेह शब्द का उपयोग आगे सूत्र ४.७ के भाष्य में भी किया गया है)। आगे योगसूत्र २-२७ के भाष्य में केवली पुरुष के स्वरूप को दिखलाते हुए कुशल का लक्षण इस प्रकार प्रगट किया गया है-एतस्यामवस्थायां गूणसम्बन्धातीतः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः केवली पुरुष इति । एतां सप्तविधां प्रान्तभूमिप्रज्ञामनुपश्यन् पुरुषः कृशल इत्याख्यायते । प्रतिप्रसवेऽपि चित्तस्य मुक्तः कुशल इत्येव भवति, गुणातीतत्वादिति । उपर्युक्त कुशल शब्द पागे सूत्र २-१३, ४-१२ और ४-३३ के भाष्य में भी व्यवहृत हा है। ४-१२ के भाष्य में तो उसके साथ अनुष्ठान भी जुड़ा हुआ है। योगसूत्र २-१४ की भोज-वृत्ति में कुशल कर्म को पुण्य कहा गया है। प्रकृत में उसका अर्थ क्षीणमोह जैसा है। जैन दर्शनगत प्राप्तमीमांसा (८) आदि ग्रन्थों में कुशल शब्द प्रायः पुण्य कर्म -सदाचरण-के लिये व्यवहृत हुआ है। सर्वार्थसिद्धि (६-७) आदि में निर्जरा के प्रसंग में उसे कुशलमूला निर्दिष्ट किया गया है । चरमदेह शब्द का उपयोग तत्त्वार्थसूत्र (२-५३) हरिवंशपुराण (६१-६२) और तत्त्वानुशासन (२२४) आदि में तद्भवमोक्षगामी जीव के लिये--जिसे आगे नवीन शरीर नहीं धारण करना पड़ेगा-किया गया है। योगसूत्रगत चरमदेह शब्द का भी अभिप्राय वही है। प्रक्षीणमोहावरण, क्षीणक्लेश-योगसूत्र १-२ के भाष्य में प्रक्षीणमोहावरण और सूत्र २-४ के भाष्य में क्षीणक्लेश शब्दों का उपयोग हुआ है। जैन दर्शन में इनके समानार्थक क्षीणमोह व क्षीणकषाय शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ है। जैसे-समयसार (३८), तत्त्वार्थसूत्र (६-४५) और दि. पंचसंग्रह (१-२५) आदि। प्राप्तमीमांसा' में अरहन्त अवस्था में दोष और आवरण की हानि सिद्ध की गई है। दोष से अभिप्राय वहां राग, द्वेष, मोह एवं प्रज्ञानादि का तथा प्रावरण से अभिप्राय ज्ञानावरण व दर्शनावरण आदि का रहा है। योगसूत्र के भाष्य में उपर्युक्त प्रक्षीणमोहावरण का भी प्रायः वैसा ही अभिप्राय रहा है । वहां प्रक्षीणमोहावरण यह चित्त के विशेषणरूप से प्रयुक्त हुआ है। सम्यग्दर्शन-योगसूत्र के भाष्य में यह कहा गया है कि अनादि दुःखरूप प्रवाह से प्रेरित योगी आत्मा और भूतसमूह को देखकर समस्त दुःखों के क्षय के कारणभूत सम्यग्दर्शन की शरण में जाता है-दुःख निवृत्ति का कारण मानकर वह उसे स्वीकार करता है। यहीं पर आगे उसे संसार के हान का -उससे मुक्ति पाने का---उपाय भी कहा गया है। १. तदेवमीदृश्यां सप्तविधप्रान्तभूमिप्रज्ञायामुपजातायां पूरुषः कुशलः (इसके स्थान में 'केवलः' पाठ भी पाया जाता है) इत्युच्यते । यो. सू. भोज. वृ. २-२७ । २. योगसूत्र १-२४ के भाष्य में भी कुशल व अकुशल के भेद से कर्म को दो प्रकार निर्दिष्ट किया गया है । यथा-कुशलाकुशलानि कर्माणि । ३. चरम संसारान्तर्वति तदभवमोक्षकारणं रत्नत्रयाराधकजीवसम्बन्धि शरीरं वज्रवृषभनाराचसंहनन युक्तं यस्यासी चरमशरीरः । गो. जी. म. प्र. व जी. प्र. टीका ३७४ । ४. दोषावरणयोहानिनिःशेषास्त्यतिशायनात् । क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तरमलक्षयः ॥४॥ ५. तदेव (प्रख्यारूपमेव चित्तसत्त्वम्) प्रक्षीणमोहावरणं सर्वत: प्रद्योतमानमविद्धं रजोमात्रया धर्म- . ज्ञान-वैराग्यश्वर्योपगं भवति । यो. सू. भाष्य. १-२. ६. तदेवमनादिना दुःख-स्रोतसा व्युह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति । Xxx हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । यो. सू. भाष्य २-१५.; आगे सूत्र ४ १५ के भाप्य में भी उक्त सम्यग्दर्शन शब्द इस प्रकार उपलब्ध होता है--सम्यग्दर्शनापेक्षं तत एव माध्यस्थ्यज्ञानमिति।
SR No.032155
Book TitleDhyanhatak Tatha Dhyanstava
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhadrasuri, Bhaskarnandi, Balchandra Siddhantshastri
PublisherVeer Seva Mandir
Publication Year1976
Total Pages200
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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