SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 77
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (५०) चक्रदत्तः। [ अशे -- - -- - -- - - - - arrowroom हिक्काश्वासप्रमेहांश्च कामलां पाण्डुरोगताम् । । रसायनवर श्वैष मेधाजनन उत्तमः । आमान्वयमुदावर्तमन्त्रवृद्धिं गुदाक्रिमीन् ॥ ७५ ॥ गुडः श्रीबाहुशालोऽयं दुर्नामारिः प्रकीर्तितः ८८।। अन्ये च ग्रहणीदोषा ये मया परिकीर्तिताः।। महाज्वरोपसृष्टानां भूतोपहतचेतसाम् ।। ७६ ।। । निसोथ, चव्य, जमालगोटाकी जड़ या छोटी दन्ती, गोखुरू, चीतकी जड़, कचूर, इन्द्रायणकी जड़, नागरमोथा, अप्रजानां तु नारीणां प्रजावर्धनमेव च। | सोंठ, वायविडंग, हरड़ प्रत्येक ४ तोला, भिलावां ३२ तोले, विजयो नाम चूर्णोऽयं कृष्णात्रेयण पूजितः ॥७७॥ विधायरा २४ तोला, जमीकन्द ६४ तोला सब दुरकुचाकर २ त्रिकटु, त्रिफला तथा त्रिमद ( नागरमोथा, चीतकी जड.. द्रोण जलमें पचाकर चतुर्थांश शेष रख, छानकर क्वाथ्य औषधियोंसे वायविडंग) वच मीठी, भुनी हीङ्ग, पाढ़, यवाखार, हल्दी, त्रिगुण (अर्थात् ४९२ तोला ) गुड मिलाकर अवलेह बनाना दारुहल्दी, चव्य, कुटकी, इन्द्रयव, चीतकी जड़, सौंफ, पांचों | चाहिये । जब गाढ़ा हो जाय, तब उतारकर निम्न लिखित नमक, पिपरामूल, बेलका गूदा, अजबाइन यह अट्ठाइस चीजें औषधियोंका चूर्ण छोड़ना चाहिये । निसोथ, चव्य, जमीकन्द प्रत्येक समान भाग ले.महीन चूर्ण कर १ तोलाकी मात्रा गरम | चीतकी जड़ प्रत्येक ८ तोला, इलायची, दालचीनी, काली जलके साथ सेवन करना चाहिये । अथवा एरण्डतैल मिलाकर | मिर्च तथा गजपीपल प्रत्येक २४ तोला का चूर्ण बना छोड़कर चाटना चाहिये । यह चूर्ण कास, सूजन, हृद्रोग, अर्श, भगन्दर, | रखना चाहिये । फिर मात्रासे इसका सेवन करना चाहिये । हजम पसलियोंका दर्द, वातगुल्म, उदररोग, हिक्का, श्वास. प्रमेह, हो जानेपर दूध तथा मांस रसादि सेवन करना चाहिये । यह कामला, पाण्डुरोग, आमयुक्त उदावर्त, अन्त्रवृद्धि, गुदाके कीडे | पाचागुल्म, प्रमेह, पाण्डुरोग, हलीमक, अर्श, उदररोग, ग्रहणी, तथा ग्रहणीदोषोंको नष्ट करता है । ज्वर तथा भूतोन्मादसे | यक्ष्मा, पानस, प्रतिश्याय तथा ऊरुस्तम्भको नष्ट करता है । यह पीड़ित तथा वन्ध्या स्त्रियोंके लिये परम उपकारी है । यह समस्त रोगोंमें लाभ पहुंचाता है पर अर्शको विशेषतया नष्ट 'विजयचूर्ण' भगवान् पुनर्वसुने कहा है ॥ ७१-७७ ॥ करता है। यह हजारों बारका अनुभूत है । इसके प्रयोग करने वाले १०० वर्षतक नीरोग होकर जीते हैं। यह आयुको बढ़ाता, बाहुशालगुडः। झरियों तथा बालों की सफेदीको नष्ट करता तथा मेधाको बढ़ाता है । यह अर्शको नष्ट करने में श्रेष्ठ 'बाहुशालनामक गुड ' उत्तम त्रिवृत्तेजोवती दन्ती श्वदंष्ट्रा चित्रकं शटी। रसायन है॥७८-८८ ॥ गवाक्षीमुस्तविश्वाह्रविडंगानि हरीतकी ॥७८ ॥ पलोन्मितानि चतानि पलान्यष्टावरुष्करात् । गुडपाकपरीक्षाः। षट्पलं वृद्धदारस्य सुरणस्य तु षोडश ॥ ७९ ॥ तोयपूर्णे यदा पात्रे क्षिप्तो न प्लवते गुडः । जलद्रोणद्वये काथ्यं चतुर्भागावशेषितम् । क्षिप्तश्च निश्चलस्तिष्ठेत्पतितस्तु न शीर्यते ॥ ८९॥ पूतं तु तं रसं भूयःकाथ्येभ्यस्त्रिगुणो गुडः ।।८०॥ यदा दर्वीप्रलेपः स्याद्यावद्वा तन्तुली भवेत् । लेहं पचेत्तु तं तावद्यावद्दप्रिलेपनम् । एष पाको गुडादीनां सर्वेषां परिकीर्तितः ॥ ९० ॥ अवतार्य ततः पश्चाच्चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ ८१॥ सुखमदः सुखस्पर्शो गुडः पाकमुपागतः । पीडितो भजते मुद्रां गन्धवर्णरसान्वितः ॥ ९१ ॥ त्रिवृत्तेजोवतीकन्दचित्रकान्द्विपलांशिकान् । जलसे भरे हुए पात्रमें छोड़नेपर जब उतरावे नहीं और एलात्वङ्मरिचं चापि गजाह्वां चापि षट्पलाम्८२] जहां गिरे वहीं बैठ जावे तथा जलमें फैले नहीं और कलछीमें द्वात्रिंशतं पलान्येवं चूर्ण दत्त्वा निधापयेत् । । चपकने लग जावे अथवा तार बन्धने लग जावें तथा मर्दन नतो मात्रां प्रयुजीत जीर्ण क्षीररसाशनः ।। ८३ ।। करनेमें. स्पर्श करनेमें अच्छा प्रतीत हो और दो अंगुलियोंक पञ्च गुल्मान्प्रमेहांश्च पाण्डुरोगं हलीमकम् । बीचमें दबानेसे अंगुलियोंकी रेखायें बनजावें तथा गन्ध वर्ण व जयेदर्शासि सर्वाणि तथा सर्वोदराणि च ।। ८४ ॥ रस उत्तम हो, तब समझना चाहिये कि गुड़ पाक दीपयेद ग्रहणीं मन्दा यक्ष्माणं चापकर्षति । उत्तम हुआ ॥ ८९-९१ ॥ पीनसे च प्रतिश्याये आढयवाते तथैव च ॥८५॥ अयं सर्वगदेष्वेव कल्याणो लेह उत्तमः । गुडभल्लातकः। दुर्नामारिरयं चाशु दृष्टो वारसहस्रशः ॥८६॥ भल्लातकसहस्र द्वे जलद्रोणे विपाधयेत् । भवन्त्येनं प्रयुञ्जानाः शतवर्ष निरामयाः। | पादशेषे रसे तस्मिन्पचेद् गुडतुलां भिषक् ॥ ९२॥ आयुषो दैर्घ्यजननो वलीपलितनाशनः ॥ ८७॥ भल्लातकसहस्रार्ध छित्त्वा तत्रैव दापयेत् ।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy