SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 73
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ४६ ) चक्रदत्तः । [ भर्शो असितानां तिलानां प्राक् प्रकुञ्चं शीतवार्यनु । खादतोऽसि नश्यन्ति द्विजदाढर्थाङ्गपुष्टिदम् २२ तिल तथा शुद्ध भिलावांका चूर्ण अग्निको दीप्त करता है, कुष्ट तथा अर्शको नष्ट करता है । तथा काले तिल, भिलावा, छोटी हर्र, गुड़ समान भाग ले चूर्ण अथवा गोली बनाकर सेवन होता है। इसी प्रकार गोमूत्र में बसायी ( रात्रिभर भिगोई गयी ) करनेसे अर्श, कास, श्वास, प्लीहा, पांडुरोग तथा ज्वर नष्ट बड़ी हर्र गुड़ मिलाकर सेवन करनेसे अथवा पञ्चकोलका चूर्ण मिलाकर मट्ठा पीनेसे अर्श नष्ट होता है । तथा जमीकन्दके ऊपर मिट्टीका लेपकर पुटपाकके विधानसे पका तैल तथा नमक मिलाकर सेवन करनेसे अर्श नष्ट होता है । तथा कडुई तोरई क्षार जलसे उबाले गये बैंगनको घीमें भूनकर गुड़के साथ तृप्ति पर्यन्त भोजन कर ऊपरसे मट्ठा पीनसे निस्सन्देह तत्काल ही अर्थ नष्ट हो जाता है तथा सात दिन सेवन करनेसे सहज अर्श भी नष्ट हो जाता है । काले तिल १ पल चबाकर ऊपरसे ठण्डा जल पीनेसे अर्श नष्ट होता है तथा दांत व शरीर पुष्ट होते हैं ॥ १६-२२ ॥ | कोई औषध नहीं है । वह वातजन्य बवासीर में विना मक्खन निकाले तथा कफजन्यमें मक्खन निकाल कर पीना चाहिये । मट्ठेके सेवन से नष्ट हुआ अर्श फिर नहीं उत्पन्न होता है ॥ ११ ॥ १२ विशेषतक्रविधानम् । ॥ त्वचं चित्रकमूलस्य पिष्ट्वा कुम्भं प्रलेपयेत् । तक्रं वा दधि वा तत्र जातमर्शोहरं पिबेत् ॥ १३ ताजी चीतकी जड़की छालको महीन पीसकर घड़े में लेप करना चाहिये, फिर उसी घडेमें जमाया गया दही अथवा उसी दहीका बनाया मट्ठा पीनेसे अर्श नष्ट होता है ॥ १३॥ अभयाप्रयोगाः । पित्तश्लेष्मप्रशमनी कच्छूकण्डूरुजापहा । गुदजान्नाशयत्याशु योजिता सगुडाभया ॥ १४ ॥ सगुड पिप्पलीयुक्तामभयां घृतभर्जिताम् । त्रिवृन्तीयुतां वापि भक्षयेदानुलोमिकीम् ॥ १५ ॥ गुड़के साथ-हर्रके चूर्णको खानेसे खुजली, छाले तथा बवासी रके मस्से नष्ट होते हैं । इसी प्रकार घी में भूजी गयी हरीतकी का चूर्ण पीके चूर्ण तथा गुड़के साथ सेवन करनेसे अथवा निसोथ वदन्तीकी जड़के चूर्णके साथ सेवन करनेसे दस्त साफ आता है। बवासीर नष्ट होती है ॥ १४ ॥ अन्ये योगाः । तिलारुष्करसंयोगं भक्षयेदग्निवर्धनम् । कुष्ठरोगहरं श्रेष्ठमर्शसां नाशनं परम् ॥ १६ ॥ तिलभल्लातकं पथ्या गुडश्चेति समांशकम् । दुर्नाम कासश्वासन्नं प्लीहपांडुज्वरापहम् ॥ १७ ॥ गोमूत्रव्युषितां दद्यात्सगुडां वा हरीतकीम् । पञ्चकोलकयुक्तं वा तक्रमस्मै प्रदापयेत् ॥ १८ ॥ मृल्लप्तं सूरणं कन्दं पक्त्वानी पुटपाकवत् । अद्यात्सतैललवणं दुर्नाम विनिवृत्तये ॥ १९ ॥ स्त्रिन्नं वार्ताकुफलं घोषायाः क्षारजन सलिलेन तद् घृतभृष्टं युक्तं गुडेनातृप्तितो योऽत्ति ॥ २० ॥ पिबति च तक्रं नूनं तस्याश्वेवातिवृद्धगुदजानि ॥ यान्ति विनाशं पुंसां सहजान्यपि सप्तरात्रेण ॥ २१ । ॥ -तकं स्यादमृतोपमम् । न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगा न तक्रसेवी व्यथते कदाचित् । यथा सुराणाममृतं हि स्वर्गे तथा नरागां भुवि तक्रमाद्दुः ॥ कैलासे यदि तक्रमस्ति गिरिशः किं नीलकण्ठो भवे - द्वैकुठे यदि कृष्णतामनुभवेदद्यापि किं केशवः । इन्द्रो दुर्भगतां क्षयं द्विजपतिर्लम्बोदरत्वं गणः कुष्ठित्वं च कुबेरको दहनतामग्निश्च किं विंदति " ॥ दन्त्यरिष्टः । दन्तीचित्रकमूलानामुभयोः पञ्चमूलयोः । भागान्पलांशानापोथ्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ २३ त्रिपलं त्रिफलायाश्च दलानां तत्र दापयेत् । रसे चतुर्थशेषे तु पूतशीते प्रदापयेत् ॥ २४ ॥ तुलां गुडस्य तत्तिष्ठेन्मासार्धं घृतभाजने । तन्मात्र या पिबन्नित्यमर्शोभ्यो विप्रमुच्यते । २५ ॥ ग्रहणी पाण्डुरोगघ्नं वातवर्चोऽनुलोमनम् । दीपनं चारुचिघ्नं च दन्त्यरिष्टमिदं विदुः । पात्रेऽरिष्टादिसंन्धानं धातकीलोध्रलेपिते ॥ २६ ॥ जमालगोटाकी जड़ अथवा छोटी दन्ती, चीतकी जड़, लघु पञ्चमूल, बृहत्पञ्चमूल प्रत्येक एक पल तथा त्रिफलाका | छिल्का तीन पल सब दुरकुचाकर एक द्रोण जलमें पकाना चाहिये, चतुर्थांश शेष रहनेपर उतार ५ सेर गुड़ मिलाकर | घी के बर्तन में १५ दिन तक रखना चाहिये। फिर छानकर १ भल्लातक-शोधनविधिः- भल्लातकानि पक्वानि समानीय क्षिपेज्गले । मज्जन्ति यानि तत्रैव शुद्धयर्थं तानि योजयेत् । इष्टका चूर्णनिकरैर्घर्षणे निर्विषं भवेत् ॥ २ इस प्रयोगको ग्रन्थान्तर में महीने भर रखने के लिये लिखा है । यथा - " त्रिफलादशमूलाग्निनिकुम्भानां पलं पलम् । वारिद्रोणे स्थितः पादशेषो गुडतुलायुतः ॥ आज्यभाण्डे स्थितो मासं दन्त्यरिष्टो निषेवितः " ॥ श्रीयुत शिवदासजी स्मृति द्वैधका दृष्टान्त देकर दोनों को प्रमाणिक बताया है । मेरे विचारसे शीत, उष्ण, काल भेदसे १५ या १ मास रखना चाहिये, अर्थात् उष्ण कालमें १५ दिन और शीत कालमें एक महीना ।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy