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________________ धिकारः]: भाषाटीकोपेतः। (२७) सन्न्न्न्न्छ न् पिठिवन, खरेटी, बेलका गूदा, सोंठ, नीलोफर और धनियांवे खश, सुगन्धवाला, नागरमोथा, धनियां, सोंठ, लजाजलसे सिद्ध की हुई पेया अनार तथा निम्बूके रससे खट्टी कर वन्तीके बीज, धायके फूल, पठानीलोध, बेलका गूदा-इनका पिलानी चाहिये ॥१॥ क्वाथ अग्निको दीप्त तथा आमका पाचन करता है । अरुचि, लासेदार दस्तोंका आना, आम, विबन्ध, अधिक पीड़ा तथा पाठादिकाथः। रक्तके दस्तोंको “जो कि ज्वरके साथ अथवा ज्वरके विना हों," पाठेन्द्रयवभूनिम्बमुस्तपर्पटकामृताः। उन्हें नष्ट करता है ॥८॥९॥ जयन्त्याममतीसारं सज्वरं समहौषधाः ॥२॥ ! पञ्चमूल्याद्विक्वाथः। पाढ़ी, इन्द्रयव, चिरायता, नागरमोथा,, पित्तपापड़ा। गुर्च तथा सोंठका काथ ज्वरसहित आमातिसारको शान्त पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः। करता है ॥२॥ पाठाभूनिम्बहीबेरकुटजत्वक्फलैः शृतम् ॥ १० ॥ हन्ति सर्वानतीसारावरदोषं वर्मि तथा । नागरादिक्वाथः। सशूलोपद्रवं श्वासं कासं हन्यात्सुदारुणम् ॥ ११ ॥ नागरातिविषामुस्तभूनिम्बामृतवत्सकैः । । लघुपञ्चमूल, खरेटी, बेलका गूदा, गुर्च, नागरमोथा, सोंठ, सर्वज्वरहरः काथः सर्वातीसारनाशनः ॥ ३॥ पाढ़, चिरायता, सुगन्धवाला, इन्द्रयव, तथा कुडेकी छालसे सोंठ, अतीस, नागरमोथा, चिरायता, गुर्च तथा करैयाकी सिद्ध किया क्वाथ-समस्त अतीसार, ज्वरदोष, व छालसे बनाया गया क्वाथ सर्वज्वर तथा सर्वातिसारको नष्ट तथा कठिन कासको नष्ट करता है ॥ १० ॥११॥ करता है ॥३॥ कलिंगादिक्वाथः। हीबेरादिक्वाथः। कलिंगातिविषाशुण्ठीकिराताम्बुयवासकम् । हीबेरातिविषामुम्तबिल्वधान्यकनागरैः। । ज्वरातिसारसन्तापं नाशयेदविकल्पतः ॥ १२॥ पिबत्पिच्छाविबन्धनं शूलदोषामपाचनम् ॥४॥ इन्द्रयव, अतीस, सोंट, चिरायता, सुगन्धवाला तथा यवासरक्तं हन्त्यतीसारं सज्वरं वाथ विज्वरम ॥ ५॥साका काथ ज्वरातिसार और सन्तापको निःसन्देह नष्ट . सगन्धवाला, अतीस, नागरमोथा, बेलका गदा. धनियां तथा करता है ॥ १२ ॥ सोंठसे सिद्ध किया क्वाथ लासेदार मरोड़से तथा रक्तयुक्त दस्तोंके वत्सकादिक्वाथः। सहित ज्वरको नष्ट करता, शूलको नष्ट करता और दोष तथा वत्सकस्य फलं दारु रोहिणी गजपिप्पली । आमका पाचन करता है ॥४॥५॥ श्वदंष्ट्रा पिप्पली धान्यं बिल्वं पाठा यवानिका१३।। गुडूच्यादिक्वाथः। द्वावप्येती सिद्धयोगी श्लोकार्द्धनाभिभाषिती । गुडूच्यतिविषाधान्यशुण्ठीबिल्वाब्दबालकः। ज्वरातीसारशमनी विशेषाद्दाहनाशनौ ॥ १४ ॥ पाठाभूनिम्बकुटजचन्दनोशीरपद्मकैः ॥ ६॥ । इन्द्रयव, देवदारु, कुटकी, गजपीपल अथवा गोखरू, छोटी कषायशीतल पेयो रातीमारठशान्तये। पीपल, धनियां, बेलका गूदा, पाढ़, अजवाइन ये आधे आधे हल्लासारोचकच्छर्दिपिपासादाहनाशनः ॥७॥ श्लोकमें कहे गये दोनों योग ज्वरातिसार तथा दाहको नष्ट गुर्च, अतीस, धनियां, सोंठ, बेलका गूदा, नागरमोथा, करते हैं ॥ १३ ॥ १४ ॥ मुगन्धवाला, पाढ़, चिरायता, कुरैयाकी छाल, लाल चन्दन, नागरादिक्वाथः। खश तथा पद्माखका क्वाथ ठण्ढा कर, ज्वरातीसार, मिचलाई, नागरामृतभूनिम्बबिल्वबालकवत्सकैः। भरुचि, वमन, प्यास और जलन शान्त करनेके लिये पीना| चाहिये ॥६॥ ७॥ समुस्तातिविषोशीरेवरातीसारहजलम् ॥ १५ ॥ ___ सोंठ, गुर्च, चिरायता, बेलका गूदा, सुगन्धवाला, कुडेकी उशीरादिक्वाथः। छाल, नागरमोथा, अतीस तथा खशका क्वाथ-ज्वरातीसारको उशीरं वालकं मुस्तं धन्याकं विश्वभेषजम् । नष्ट करता है ॥१५॥ समंगा धातकी लोभ्रं बिल्वं दीपनपाचनम् ॥ ८॥ . मुस्तकादिक्वाथः। हन्त्यरोचकपिच्छामं बिबन्धं सातिवेदनम् । । मुस्तकबिल्वातिविषापाठाभूनिम्बबत्सकैः काथः। सशोणितमतीसारं सज्वरं वाथ विज्वरम् ॥९॥' मकरन्दगर्भयुक्तो ज्यरातिसारी जयेदोरी ॥१६॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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