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________________ (२४) चक्रदत्तः। (ज्वरा --more - -- - - औषधंसे अष्टगुण दूध तथा दूधसे चतुर्गुणं जल मिलाकर विरेचनम्। पकाना चाहिये । दूधमात्र शेष रहनेपर उतार लेना चाहिये।। आरग्वधं वा पयसा मृद्वीकानां रसेन वा। यही क्षीरपाककी विधि है ॥ २५७ ॥ त्रिवृतां त्रायमाणांवा पयसा ज्वरितः पिबेत् ॥२६३ त्रिकण्टकादिक्षीरम् । अमलतासका गूदा दूधके अथवा अङ्गुरके रसके साथ अथवा निसोथ व त्राणमाण धके साथ ज्वरवालेको पनिा त्रिकण्टकबलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् । चाहिये, इससे हलका रेचन होगा ॥ २६३॥ व!मूत्रविबन्धनं शोफज्वरहरं पयः॥ २५८ ॥ गोखुरू, खरेटी, कटेरी, गुड़ तथा सोंठसे सिद्ध किया दूध . संशोधननिषेधः। मलमूत्रकी रुकावट, सूजन तथा ज्वरको नष्ट करता है ॥२५८ ॥ ज्वरक्षीणस्य न हितं वमनं न विरेचनम् । वृश्चीराद्यं क्षीरम् । कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ॥२६४ ज्वरसे जो रोगी क्षीण हो रहा हो, उसको वमन अथवा विरेवृश्चीरविश्ववर्षाभूः पयश्चोदकमेव च । चन न करना चाहिये । किन्तु दूध पिलाकर अथवा निरूहण पचेक्षीरावाशिष्टं तु तद्धि सर्वज्वरापहम् ।। २५९ ।। वस्ति देकर उसका मल निकालना चाहिये ॥ २६४ ॥ श्वेत पुनर्नवा, सोंठ, लाल पुनर्नवा, दूध और जल मिलाकर पकाना चाहिये । दूधमात्र शेष रह जानेपर उतार कर पिलाना| वस्तिविधानम् । चाहिये । यह समस्त ज्वरको नष्ट करता है ॥२५९ ॥ प्रयोजयेज्ज्वरहरान्निरूहान्सानुवासनान् । क्षीरविनिश्चयः। पक्वाशयगते दोषे वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु ॥२६५।। - दोष यदि पक्काशयमें स्थित हों, तो सिद्धिस्थानमें जो निरूशीतं कोष्णं ज्वरे क्षीरं यथास्वै हण तथा अनुवासन वस्तियां बताया गया है, उनका प्रयोग एरण्डमलसिद्धं वा ज्वरे सपरिकर्तिके ।। २६० ॥ करना चाहिये ॥ २६५॥ ज्वरमें जैसा दोष (वात या पित्त ) हो, उसके अनुसार ओषधियों द्वारा सिद्ध कर पित्तमें शीत तथा वातमें कोष्ण विरेचननस्यम् । दूधका प्रयोग करना चाहिये । और यदि गुदामें कर्तनके समान | गौरवे शिरसः शूले विद्धेष्विन्द्रियेषु च । पीड़ा होती हो, तो एरण्डकी छालसे सिद्ध कर दूध पीना | जीर्णज्वरे रुचिकरं दद्याच्छीर्षविरेचनम् ॥२६६ ॥ बाहिये ॥२६॥ शिरके भारीपन तथा दर्दमें तथा इन्द्रियोंके अपने विषय संशोधननिश्चयः। ग्रहण करनेमें असमर्थ होनेपर जीर्ण ज्वरमें शिरोविरेचन (नस्य ) | देना चाहिये, इससे इन्द्रियोंको अपने विषय ग्रहणकी रुचि उत्पन्न ज्वरिभ्यो बहुदोषेभ्य ऊर्ध्व चाधश्च बुद्धिमान् । । होती है ॥ २६६॥ दद्यात्संशोधनं काले कल्पे यदुपदेक्ष्यते ॥ २६१ ॥ आधिक दोषयुक्त ज्वरवालोंके लिये संशोधनयोग्य कालमें अभ्यङ्गादिविभागः। ऊर्ध्वमार्ग तथा अधोमार्गसे संशोधन (वमन विरेचन ) करना अभ्यङ्गाश्च प्रदेहांश्च सस्नेहान्सानुवासनान् । चाहिये जो कि कल्पस्थानमें कहेंगे॥ २६१ ॥ . विभज्य शीतोष्णकृतान्दद्याज्ज्जीर्णज्वरे भिष२६७ वमनम् । तैराशु प्रशमं याति बहिर्मार्गगतो ज्वरः। . मदनं पिप्पलीभिर्वा कलिङ्गैर्मधुकेन वा। लभन्ते सुखमङ्गानि बलं वर्णश्च वर्धते ॥२६८ ॥ युक्तमुष्णाम्बुना पीतं वमनं ज्वरशान्तये ॥२६२॥ स्नेहके सहित अभ्यङ्ग ( मालिश ), लेप अथवा अनुवासन मैनफल, छोटी पीपल, इन्द्रयव, अथवा मोरेठकि महीन वस्ति शीत अथवा उष्ण पदार्थोंसे जेसी आवश्यकता हो, देना चूर्णके साथ गरम जल मिलाकर पिलानेसे वमन होकर घर चाहिये । शीतजन्य ज्वरमें उष्ण तथा उष्णजन्य ज्वरमें शीत शान्त होता है ॥ २६२॥ | १“शीतेनोष्णकृतानोगाञ्छ मयन्ति भिषग्विदः । ये च शीतकृता रोगास्तेषामुष्णं भिषग्जितम् ॥ १क्षीरपाकमें औषध महीन पीस पानी मिला छान दूधमें| अर्थात् वैद्यजन शीतद्वारा उष्णजन्य रोगोका शमन करते हैं मिलाकर पकाना चाहिये। और शीतजन्य रागोंके शमनकी उष्ण ओषधि है।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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