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________________ ( २० ) चक्रदत्तः । विषमज्वरहरविरेचनम् । नीलिनीमजगन्धां च त्रिवृतां कटुरोहिणीम् । पिबेज्ज्वरस्यागमने स्नेहस्वेदोपपादितः ॥ २१३ ॥ पहिले स्नेहन तथा स्वेदन कर ज्वर आनेवाले दिन नील, बबई, निसोथ व कुटकीका क्वाथ पूर्णमात्रा में पिलाना चाहिये, इससे विरेचन होगा ॥ २१३ ॥ विषमज्वरे पथ्यम् । सुरां समण्डां पानार्थे भक्ष्यार्थे चरणायुधम् । तित्तिरींश्च मयूरांश्च प्रयुञ्ज्याद्विषमज्वरे ॥ २१४ ॥ विषमज्वर में मण्ड या शराब पीनेके लिये भोजन के लिये मुर्गे, तीतर या मयूरोका प्रयोग करना चाहिये ॥ २१४ ॥ अम्लोटजसहस्रेण दलेन सुकृतां पिबेत् । पेयां घृतप्लुतां जंतुचातुर्थिकहरीं त्र्यहम् ॥ २१५ ॥ १००० आमलोनियां ( चांगेरी ) की पत्तीकी पेया बना श्री मिलाकर तीन दिनतक विषमज्वर नाश करनेके लिये पीना चाहिये ॥ २१५ ॥ विषमज्वरहरमञ्जनम् । सैन्धवं पिप्पलीनां च तण्डुलाः समनःशिलाः । नेत्राञ्जनं तैलपिष्टं विषमज्वरनाशनम् ॥ २१६ ॥ संधानमक, छोटी पीपलके दाने, शुद्ध मनशिल तेलमें पीसकर नेत्रो लगानेसे विषमज्वर न होता है || २१६ ॥ नस्यम् । व्याघीर साहिगुसमा नस्यं तद्वत्स सैन्धवा ॥ २१७॥ छोटी कटेरी, रासन, हींग तथा सेंधानमकका नस्य इसी प्रकार विषमज्वरको नष्ट करता है ॥ २१७ ॥ धूपः । नस्यान्तरम् । शिरीषपुष्पस्वरसो रजनीद्वयसंयुतः । नस्यं सर्पिः समायोगाच्चतुर्थिकहरं परम् ॥ २१९ ॥ सिरसाके फूलोंका स्वरस, हल्दी, दारूहल्दीका चूर्ण तथा घी मिलाकर नस्य देनेसे चौथिया ज्वर छूट जाता है ॥ २१९ ॥ [ ज्वरा धूपान्तरम् । पलङ्कषा निम्बपत्रं वचा कुष्ठं हरीतकी || २२० ॥ सर्षपाः सयवाः सर्पिर्धूपनं ज्वरनाशनम् । पुरध्यामवचासर्जनिम्बार्कागुरुदारुभिः ।। २२१ । सर्वज्वरहरो धूपः कार्योऽयमपराजितः । गुग्गुल, नमिके पत्ते, बच, कूठ, बड़ी हर्रका छिल्का, सरसों, यव, घी मिलाकर अथवा गुग्गुल, रोहिप घास, बच, राल, चाहिये ॥ २२० ॥ २२५ ॥नीमकी पत्ती, आककी जड़, अगर तथा aervaा धूप देना बेडालं वा शकृद्योज्यं वेपमानस्य धूपने ॥ २२२ ॥ कम्पते हुए रोगीको बिडालकी विष्ठाका धूप देना चाहिये ॥ २२२ ॥ कृष्णाम्बरदृढाबद्धगुग्गुलूलूकपुच्छजः । धूपश् चातुर्थिकं हन्ति तमः सूर्य इवोदितः ॥ २२८ ॥ काले कपड़े में गुग्गुल तथा उल्लूकी पूंछ बांधकर धूप देनेसे चतुर्थिक ज्वर ऐसे नष्ट होता है, जैसे सूर्योदयसे अन्धकार नष्ट हो जाता है ।। २१८ ॥ लेप अपरे योगाः । अपामार्गजटा कट्यां लोहितैः सप्ततन्तुभिः । बद्ध्वा वारे वेस्तूर्णं ज्वरं हन्ति तृतीयकम् २२३|| की जड़ सात लाल डोरोंसे कमर में रविवार के दिन बांधनेसे तृतीयक ( तीसरे दिन आनेवाला ) ज्वर नष्ट होता है ॥ २२३ ॥ काकजंघा बला श्यामा ब्रह्मदण्डी कृताञ्जलिः । पृश्निपर्णी त्वपामार्गस्तथा भृंगरजोऽष्टमः || २२४ ॥ एषामन्यतमं मूलं पुष्येणोद्धृत्य यत्नतः । रक्तसूत्रेण संवेष्टय बद्धमै काहिकं जयेत् ।। २२५ । काकजंघा, बरियारी, निसोथ या विधारा, ब्रह्मदण्डी, लज्जा, पिठिवन, लटजीरा तथा भांगरा- इनमें से किसी एककी जड़ पुष्यनक्षत्र में उखाड़ लाल डोरेसे लपेटकर हाथ या गलेमें बांधनेसे एकाहिक ज्वर नष्ट होता है ।। २२४ ॥ २२५ ॥ मूलं जयन्त्याः शिरसा धृतं सर्वज्वरापहम् । अरनीकी जड़ चोटीमें बांधने अथवा जलसे पीसकर शिरमें करनेसे समस्त ज्वर दूर होते हैं । विशिष्टचिकित्सा | कर्म साधारणं जह्यात्तृतीयक चतुर्थको । आगन्तुरनुबन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे ॥ २२६ ॥ दोनों चिकित्सायें ( दैवव्यपाश्रय - बलिमंगलहोमादि तथा युक्तिव्यपाश्रय - कषायलेहादि ) तृतीयकचतुर्थक ज्वरको नष्ट करती हैं । केवल युक्तिव्यपाश्रय कषायादि ही नहीं | क्योंकि विषमज्वर में प्रायः आगन्तुक ( भूतादि) का संसर्ग होता नस्यं चातुर्थिकं हन्ति रसो वागस्त्यपत्रज्ञः । अगस्त्य के पत्तों के रसका नस्य भी चातुर्थिकको नष्ट करता है । है । २२६ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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