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________________ धिकारः] भाषाटीकोपेतः। - प्रक्षेप्यौषधनिर्णयः। | धर्मात्सिध्यति सर्व श्रेयस्तद्धर्मसिद्धये किमपि । त्रिफलात्रिकटुकचित्रककान्तक्रामकविडङ्गचर्णानि ।। शक्त्यनुरूपं दद्याद् द्विजाय सन्तोषिणे गुणिने।।५४ अन्यान्यपि देयानि पलाशवृक्षस्य च बीजानि॥४६ सन्तोष्य कर्मकारं प्रसादपुगादिदानसम्मानैः । जातीफलजातीकोषैलाकक्कोलकलवङ्गानाम् । । आदौ तदश्मसारं निर्मलमेकान्ततः कुर्यात् ॥५५॥ सितकृष्णजीरकयोरपि चूर्णान्ययसः समानि स्युः। तदनु कुठारच्छिन्नात्रिफलागिरिकर्णिकास्थिसंहारैः। त्रिफलात्रिकटुविडङ्गा नियता अन्ये यथाप्रकृति ॥ करिकर्णच्छदमूलकशतावरीकेशराजाख्यैः ॥५६॥ कालायसदोषहृतेर्जातीफलादेर्लवङ्गान्तस्य । शालिंचमूलकाशीमूलप्रावृजभृङ्गराजैश्च । क्षेपः प्राप्त्यनुरूपः सर्वस्योनस्य चैकाद्यैः ।। ४८॥ लिप्त्वा दग्धव्यं तद् दृष्टिक्रियलोहकारेण ॥ ५७ ॥ कान्तक्रामकमेकं निःशेषं दोषमपहरत्ययसः। । चिरजलभावितविमलं शालाङ्गारेण परित आच्छाद्य द्विगुणत्रिगुणचतुर्गुणमाज्यं ग्राह्यं यथाप्रकृति ॥४९॥ कुशलाध्मापितभस्त्रानवरतमुक्तेन पवनेन ॥ ५८॥ यदि भेषजभूयस्त्वं स्तोकत्वं वापि चूर्णानाम्।। वर्बाह्यज्वाला बोद्धव्या जातु नैव कुञ्चिकया । अयसा साम्यं संख्या भूयोऽल्पत्वेन भूयोऽल्पा॥५० मृङवणसलिलभाजा किन्तु स्वच्छाम्बुसंप्लुतया ५९ एवं धात्वनुसारात्तत्तत्कथितोषधस्य बाधेन । द्रव्यान्तरसंयोगात्स्वां शक्तिं भेषजानि मुञ्चन्ति । सर्वत्रैव विधेयस्तत्तक्कथितस्यौषधस्योहः ॥५१॥ मलधूलीमत्सर्व सर्वत्र विवर्जयेत्तस्मात् ।। ६०॥ त्रिफला, त्रिकटु, चीतेकी जड़, नागरमोथा, वायविडङ्ग, सन्दंशेन गृहीत्वान्तः प्रज्वालिताग्निमध्यमुपनीय । ढाकके बीज, जायफल, जावित्री, इलायची, कंकोल, लवङ्ग, सफेद जीरा, काला जीरा समस्त समान भागमें मिलित द्रव्योंका गलति यथायथमनो तथैव मृदु वर्धयोनिपुणः ॥६१ चूर्ण मिलकर लोहके बराबर लेना चाहिये। इनमेंसे त्रिफला, तलनिहितोर्ध्वमुखांकुशलग्नं त्रिफलाजले । त्रिकटु और वायविडङ्ग अवश्य डालना चाहिये । और द्रव्य | विनिक्षिप्य निर्वापयेच्छेषं त्रिफलाम्बु रक्षेच्च ॥६२॥ प्रकृतिके अनुसार छोड़ना चाहिये । तथा लोहके दोष दूर करनेके यल्लौहं न मृतं तत्पुनरपि पक्तव्यमुक्तमार्गेण । लिये जायफलसे लवंगतक जितने द्रव्य गिनाये हैं, वे एक दो यन्न मृतं तथापि तत्त्यक्तव्यमलौहमेव ततः॥६३ ॥ न मिलनेपर जितने मिल सकें, उतने ही अवश्य छोड़ने चाहिये। तथा नागरमोथा अकेला ही लोहके सब दोष दूर करता है, अतः तदनु घनलौहपात्रे कालायसो मुद्रेण संचूर्ण्य । उसे अवश्य छोड़े। तथा रोगीकी प्रकृतिके अनुसार (क्रमशः कफ, दत्त्वा बहुशः सलिलं प्रक्षाल्याङ्गारमुद्धृत्य ॥६४॥ पित्त, वातमें ) द्विगुण, त्रिगुण तथा चतुर्गुण घी छोड़ना चाहिये ।। तदयः केवलमग्नौ शुष्कीकृत्याथवातपे पश्चात् । । यदि ओषधियां अधिक हों, अर्थात् सब मिल जावें, तो प्रत्येक | लोहशिलायां पिण्यादसितेऽश्मनि वा तदप्राप्तौ ६५ चूर्ण थोड़ा और यदि कम मिले तो प्रत्येक चूर्ण अधिक छोडना अब कान्तादिलोहकी मारण विधि कहते हैं। जिस रोगीके चाहिये। अर्थात् औषधियोंकी संख्याके न्यूनाधिक्यसे चूर्णकी | लिये लोह बनाना है, उसके लिये शुभ नक्षत्रादिसे युक्त दिनमें मात्रा कम या अधिक न होगी । वह प्रत्येक अवस्थामें मिलकर मिट्टी और अङ्गारों को मिला लिपी गयी भूमिपर शंकरजीका लोहके बराबर ही होनी चाहिये । इसी प्रकार रोगीकी प्रकृतिके पूजन कर वैदिकविधिसे अग्नि स्थापित कर आहति करनी अनुसार कही हुई औषधियों को भी अलग करना तथा अनुक्त चाहिये । धर्मसे सर्व कार्य सफल होते हैं, अतः धर्मार्थ किसी औषधियां भी छोड़नी चाहियें ॥ ४६-५१॥ सन्तोषी गुणवान् ब्राह्मणके लिये शक्तिके अनुकूल दान करना लोहमारणविधिः। चाहिये । फिर लुहारको सुपारी, पान तथा प्रसाद आदि देकर सम्मानित तथा सन्तुष्ट करना चाहिये । पहिले उस लोहको कान्तादिलोहमारणविधानसर्वस्वमुच्यते तावत् । बिल्कुल शुद्ध कर लेना चाहिये (लोहशोधनकी कोई परिभाषा यस्य कृते तल्लौहं पक्तव्यं तस्य शुभे दिवसे॥५२॥ ग्रन्थकारने नहीं लिखी । यद्यपि शिवदासजीने लिखी है, पर वह समृदङ्गारकरालितनतभूभागे शिवं समभ्यर्च्य । अतिविस्तृत होनेसे तथा अधिक कष्टसाध्य होनेसे छोडता हूं और वैदिकविधिना वह्नि निधाय हुत्वाहुतीस्तत्र॥५३॥ रसप्रन्थोंमें जो अनेक पद्धतियाँ बतलायी गयी हैं उनमेंसे एक यह है१ उक्त प्रक्षेप्य औषधियां लोह सिद्ध हो जानेपर ही “चिश्चापत्रजलक्काथादयो दोषमुदस्यति । ... मिलाना चाहिये। यद्वा फलत्रयोपेते गोमूत्र कथितं खलु " -
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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