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________________ (२६६) चक्रदत्तः। [नेत्ररोगा - Poooorkee or ora Fow-are-ere लगानेसे सरलतासे खोलती और आंखोंको स्वच्छ बनाती | तेजपात, गेरू, कपूर, मौरेठी, नीलोफर, सुर्मा व नागकेशरका है ॥ १२५-१२९॥ अञ्जन समस्त तिमिरोंको नष्ट करता है ॥ १३५॥ पिप्पल्यादिवतिः। शंखाद्यञ्जनम् । पिप्पली सतगरोत्पलपत्रां शङ्खस्य भागाश्चत्वारस्तदर्धेन मनःशिला । वर्तयेत्समधुकां सहरिद्राम् । मनःशिलार्ध मरिचं मरिचार्धेन पिप्पली ।। १३६॥ एतया सततमञ्जयितव्यं वारिणा तिमिरं हन्ति अर्बुद हन्ति मस्तुना । यः सुपर्णसममिच्छति चक्षुः ॥ १३०॥ | पिचिटं मधुना हन्ति स्त्रीक्षीरेण तदुत्तमम् ॥१३७॥ छोटी पीपल, तगर, नीलोफर, मोरेठी और हल्दीके चूर्णको | शंख ४ भाग, मनशिल २ भाग, मिर्च १ भाग, व छोटी जलमें पीसकर बनायी हुई बत्तीसे आंजनेसे सुपर्णके सदृश दृष्टि पीपल आधा भाग, घोटकर जलके साथ लगानेसे तिमिर, दहीके होती है ॥ १३०॥ | तोड़से अर्बुद, शहदसे पिच्चिट और स्त्रीदुग्धसे फूलीको नष्ट व्योषादिवर्तिः। | करता है ॥ १३६ ॥ १३७ ॥ व्योषायश्चूर्णसिधूत्थत्रिफलाजनसंयुता । हरिद्रादिगुटिका। गुडिका जलपिष्टेयं कोकिला तिमिरापहा ॥१३१॥ | हरिद्रा निम्बपत्राणि पिप्पल्यो मरिचानि च। त्रिकटु, लोह चूर्ण, सेंधानमक, त्रिफला और अञ्जनके साथ भद्रमुख विडङ्गानि सप्तमं विश्वभेषजम् ।। १३८ ।। बनायी गयी बत्ती तिमिरको नष्ट करती है। इसे "कोकिला वर्ती" गोमूत्रेण गुटी कार्या छागमूत्रेण चालनम् । कहते हैं । १३१॥ ज्वरांश्च निखिलान्हन्ति भूतावेशं तथैव च ॥१३९ अपरा व्योषादिः। वारिणा तिमिरं हन्ति मधुना पटलं तथा। नक्तान्ध्यं भृङ्गराजेन नारीक्षीरेण पुष्पकम् । त्रीणि कटूनि करञ्जफलानि शिशिरेण परिस्रावमबुंदं पिच्चिटं तथा ॥ १४०॥ द्वे च निशे सह सैन्धवकं च बिल्वतरोवरुणस्य च मूलं हल्दी, नीमकी पत्ती, छोटी पीपल, काली मिर्च, नागर. वारिच दशमं प्रवदन्ति ।। १३२ ।। मोथा, वायविडङ्ग व सोंठेका चूर्ण गोमूत्रसे गोली बनानी | चाहिये । तथा बकरेके मूत्रसे आंजना चाहिये । यह हन्ति तमस्तिमिरं पटलं च । |समस्त ज्वरों तथा भूतावेशको नष्ट करती है, जलसे तिमिपिच्चिटशुक्रमथार्जुनकं च रको, शहदसे पटलको, भांगरेसे रतौंधी स्त्रीदूधसे फूली और अञ्जनकं जनरञ्जनकं च ठण्ढे जलसे परिस्राव, अर्बुद तथा पिचिटको नष्ट करती हक्च न नश्यति वर्षशतं च ॥ १३३॥ है ॥ १३८ ॥१४॥ त्रिकटु, कजा, हल्दी, दारुहल्दी, सेंधानमक, बेलकी छाल, वरुणकी छाल, व शंखको पीस वत्ती बना आंखमें लगानेसे गण्डूपदकज्जलम् । अन्धेरापन, तिमिर, पटल, पिचिट, शुक्र, व अर्जुन नष्ट होता संगृह्योपरतानलक्तकरसेनामृज्य गण्डूपदान है । यह अञ्जन मनुष्योंको प्रसन्न करता है । इससे दृष्टि १०० लाक्षारजिततूलवर्तिनिहितान् यष्टीमधून्मिश्रितान् । वर्षतक नहीं बिगड़ती ॥ १३२-१३३ ॥ प्रज्वाल्योत्तमसर्पिषानलशिखासन्तापज कजलं दूरासन्ननिशान्ध्यसर्वतिमिरप्रध्वंसकृच्चोदितम् १४१ नीलोत्पलाद्यञ्जनम् । मरे केचुवोंको ले धो लाखके रससे धो लाखसे रङ्गी रूईकी नीलोत्पलं विडङ्गानि पिप्पली रक्तचन्दनम् । बत्तीमें मौरेठीके साथ लपेट घीसे तर कर अग्निसे जला अञ्जनं सैन्धवं चैव सद्यस्तिमिरनाशनम् ।। १३४॥ कज्जल बनाना चाहिये। यह पुराने व नये दोष तथा दूर या नीलोफर, वायविडङ्ग, पीपल, लालचन्दन, अजन और समीपकान दिखाई देना, रतौंधी और समस्त तिमिरोंको नष्ट सेंधानमकका अञ्जन शीघ्र ही तिमिरको नष्ट करता है ॥१३४॥ करता है ॥ १४१॥ पत्राद्यञ्जनम् । _अङ्गुलियोगः। पत्रगैरिककर्पूरयष्टीनीलोत्पलाञ्जनम् । भूमी निघृष्टयाङ्गुल्या अञ्जनं शमनं तयोः । नागकेशरसंयुक्तमशेषतिमिरापहम् ॥१३५ ।। ] तिमिरकाचार्महरं धूमिकायाश्च नाशनम् ॥ १४१ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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