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________________ विकारः] · भाषाटीकोपेतः। शंखाद्यञ्जनम् । प्रस्थमामलकानां च काथयेनल्वणेऽम्भसि । शङ्खस्य भागाश्चत्वारस्ततोऽर्धन मनःशिला। पादशेषे रसे तस्मिन्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥९॥ मनःशिलार्ध मरिच मरिचार्धेन सैन्धवम् ॥८१॥ कल्कै निम्बकुटजमुस्तयष्टयाह्वचन्दनः। एतच्चूर्णाजनं श्रेष्ठं शुक्रयोस्तिामिरेषु च । सपिप्पलीकैस्तत्सिद्धं चक्षुष्यं शुक्रयोर्हितम् ।।९१ ।। पिच्चटे मधुना योज्यमबुंदे मस्तुना तथा ॥ ८२॥ | घ्राणकर्णाक्षिवम॑त्वङ्मुखरोगत्रणापहम् । . शंख ४ भाग, मैनसिल २ भाग, कालीमिर्च १ भाग तथा| कामलाज्वरवीसर्पगण्डमालाहरं परम् ॥ ९२ ॥ सेंधानमक आधा भाग इनका चूर्णाजन बनाकर लगानेसे | परवल, कुटकी, दारुहल्दी, नीम, अडूसा, त्रिफला, शुक्र तथा तिमिर नष्ट होता है । इसका पिच्चिटमें शहदके | यवासा, पित्तपापड़ा, तथा त्रायमाण प्रत्येक एक पल, आँवला, साथ तथा अर्बुदमें दहीके तोड़के साथ प्रयोग करना। १ प्रस्थ, जल १ द्रोणमें पकाना चाहिये। चतुर्थांश शेष रहने. चाहिये ॥८१॥८२॥ पर उतार छान एक प्रस्थ घी तथा चिरायता, कुड़ा, नागरअन्यान्यञ्जनानि । मोथा, मौरेठी, चन्दन व छोटी पीपलका कल्क छोड़कर पकाना चाहिये । यह घृत नेत्रोंको बलदायक, शुक्रनाशक, नासा, कान, ताप्यं मधुकसारो वा बीजं चाक्षस्य सैन्धवम् । | नेत्र, विनियों व त्वचारोग, मुखरोग और व्रणोंको नष्ट करता मधुनाजनयोगाः स्युश्चत्वारः शुक्रशान्तये।। ८३ ॥ तथा कामला, घर, विसर्प व गण्डमालाको हरता वटक्षीरेण संयुक्तं श्लक्ष्णं कर्पूरज रजः। है ॥ ८९ ॥९२ ॥ क्षिप्रमजनतो हन्ति शुक्रं चापि घनोन्नतम् ॥८४॥ त्रिफलामज्जमङ्गल्यामधुकं रक्तचन्दनम् । कृष्णादितैलम् । पूरणं मधुसंयुक्तं क्षतशुक्राजकाश्रुजित् ॥ ८५॥ कृष्णाविडङ्गमधुयष्टिकासन्धुजन्मस्वर्णमाक्षिक, मोरेठी, बहेड़ेकी भींगी अथवा सेंधानमक विश्वौषधैः पयसि सिद्धमिदं छगल्याः। इनमें से किसी एकके चूर्णको शहदमें मिलाकर लगानेसे फूली तैलं नृणां तिमिरशुक्रशिरोऽक्षिशूलशान्त होती है। इसी प्रकार बरगदके दूधके साथ कपूरका चूर्ण पाकात्ययाञ्जयति नस्यविधौ प्रयुक्तम्॥१३॥ लगानेसे कड़ी व ऊँची फूली मिटती है। तथा त्रिफलाकी गुठलियाँ, गोरोचन, मोरेठी व लाल चन्दन चूर्णको शहदके साथ छोटी पीपल, वायविडंग, मोरेठी, सेंधानमक व सोंठ के आँखमें लगानेसे व्रणशुक्र, अजका और अश्रु शान्त होते कल्क और बकरीके दूधमें सिद्ध तेलका नस्य देनेसे तिमिर, हैं ॥ ८३-८५॥ शुक्र, शिर व नेत्रका शूल तथा पाकात्ययादि नष्ट होते हैं॥१३॥ क्षाराञ्जनम् । अजकाचिकित्सा। सालस्य नारिकेलस्य तथैवारुष्करस्य च । अजकां पार्श्वतो विद्ध्वा सूच्या विस्राव्य चोदकम्। करीरस्य च वंशानां कृत्वा क्षारं परिसुतम् ॥८६॥ व्रणं गोमयचूर्णेन पूरयेत्सर्पिषा सह ॥ ९४ ।। करभास्थिकृतं चूर्ण क्षारेण परिभावितम् । सैन्धवं वाजिपादं च गोयेचनसमन्वितम् । सप्तकृत्वोऽष्टकृत्वो वा श्लक्ष्णं चूर्ण तु कारयेत्॥८७ शेलुत्वप्रससंयुक्त पूरणं चाजकापहम् ॥ ९५ ॥ एतच्छुक्रेष्वसाध्येषु कृष्णीकरणमुत्तमम् । । यानि शुक्राणि साध्यानि तेषां परममञ्जनम् ।। ८८. अजकाको बगलसे वेध जल निकालकर उस घावमें घीसे मिले गोबरके चूर्णको भरना चाहिये । तथा सेंधानमक, ताल, नरियल, भिलावा, करीर तथा बाँस प्रत्येकका क्षार सफेद गोकर्णी तथा गोरोचनको लसोढेकी छालके स्वरसके साथ पतला बनाकर उसीसे हाथीकी हहीके चूर्णकी ७ या आठ घोटकर आँखों में डालनेसे अजका नष्ट होती है।९४ ॥१५॥ भावना देकर महीन चूर्ण कर लेमा चाहिये । यह असाध्य शुकोंको काला कर देता तथा साध्यको अच्छा कर देता शशकघृतव्यम् । है ॥८६-८८॥ शशकस्य शिरः कल्के शेषाङ्गकथिते जले । __ पटोलाचं घृतम् । घृतस्य कुडवं पकं पूरणं चाजकापहम् ॥ ९६ पटोले कटुको दार्वी निम्बं वासां फलत्रिकम् । । शशकस्य कषाये च सर्पिषः कुडवं पचेत् । दुरालभां पर्पटकं त्रायन्ती च पलोन्मिताम् ॥८९॥ यष्टीप्रपोण्डरीकस्य करकेन पयसा समम् ॥१७॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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