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________________ धिकारः भाषाटीकोपेतः। (२५७) चित्रकहरीतकी। पाचनानि । चित्रकस्यामलक्याश्च गुडूच्या दशमूलजम् । । स्वेदः प्रलेपस्तिक्तान्नं सेको दिनचतुष्टयम् । शतं शतं रसं दत्त्वा पथ्याचूर्णाढकं गुडात् ॥२८॥ लंघनं चाक्षिरोगाणामामानां पाचनानि षट् । शतं पचेद् घनीभूते पलं द्वादशकं क्षिपेत् । . । अञ्जनं पूरणं काथपानमामे न शस्यते ॥४॥ व्योषत्रिजातयोः क्षारात्पलार्धमपरेऽहनि ॥२९॥ स्वेद, प्रलेप, तिक्तान, सेक, नेत्र दखनेपर चार दिन व्यतीत प्रस्थाध मधुनो दत्त्वा यथाग्न्यद्यादतन्द्रितः। होजाना, लंघन यह छः आम नेत्ररोगोंके पाचन हैं । तथा अञ्जन, वृद्धयेऽग्नेः क्षयं कासं पीनसं दुस्तरं क्रिमीन् । पूरण और क्वाथपान आममें हितकर नहीं है ॥४॥ गुल्मोदावर्तदुर्नामश्वासान्हन्ति रसायनम् ॥३०॥ पूरणम् । चीतकी जड़, आंवला, गुर्च, दशमूल, प्रत्येक ५ सेर धात्रीफलनिर्यासो नवहक्कोपं निहन्ति पूरणतः। रस ( क्वाथ) में छोटी हरोंका चूर्ण ३ सेर १६ तो०, सक्षौद्रसैन्धवो वा शिद्भवपत्ररससेकः ॥५॥ गुड़ ५ सेर छोड़कर पकाना चाहिये, गाढ़ा हो जानेपर | मिलित त्रिकटु, त्रिफला ४८ तोले (अर्थात् प्रत्येक ८ तोला) दारिसाजनं वापि स्तन्ययुक्तं प्रपूरणम् । जवाखार २ तोला छोड़ना चाहिये । दूसरे दिन ३२ तोला निहन्ति शीघ्र दाहाश्रुवेदनाः स्यन्दसम्भवाः ॥६॥ शहद मिलाना चाहिये, फिर अग्निके अनुसार सावधानीसे सेवन | आंवलेके फलका रस पूरण करनेसे नवीन नेत्ररोगको नष्ट करना चाहिये । इससे अग्नि बढ़ती तथा क्षय, कास, कठिन करता है। अथवा शहद व सेंधानमक(के)साथ सहिजनके पत्तोंके रसका सेक । अथवा दारुहल्दीके क्वाथसे यथाविधि साधित पीनस, क्रिमि, गुल्म, उदावर्त, अर्श, व श्वासरोग नष्ट होते हैं। रसौतको स्त्रीके धमें पीसकर छोड़नेसे अभिष्यन्दजन्य जलन, यह रसायन है ॥ २८-३०॥ इति भासारोगाधिकारः समाप्तः। अधु और पीड़ा शान्त होते हैं ॥ ५॥६॥ करवीरजलसेकः। करवीरतरुणकिसलयच्छेदोद्भवबहुलसलिलसंपूर्णम् । | नयनयुगं भवति दृढे सहसैव तत्क्षणात्कुपितम् ॥७॥ ___ कनेरकी मुलायम पत्तियोंके तोड़नेसे निकला जल आंखमें सामान्यतश्चिकित्साक्रमः। भरनेसे सहसा कुपित नेत्र दृढ़ होते हैं ॥ ७ ॥ लंघनालेपनस्वेदशिराव्यधविरेचनैः । शिखरियोगः। उपाचरदेभिष्यन्दानजनाश्च्योतनादिभिः ॥१॥ लंघन, आलेपन, स्वेद, शिराव्यध, विरेचन, अजन, शिखरिमूलं ताम्रकभाजने स्तोकसैन्धवोन्मिश्रम् । तथा आश्च्योतनादिसे अभिष्यन्दोंकी चिकित्सा करनी| मस्तु निघृष्टं भरणाद्धरति नवं लोचनोत्कोपम् ॥८॥ चाहिये ॥१॥ अपामार्गकी जड़, थोड़े सेंधानमक और दहीके तोडको ताम्रपात्रमें घिसकर आँखमें छोड़नेसे नवीन नेत्ररोग नष्ट होता ___ श्रीवासादिगुण्डनम् । श्रीवासातिविषालोधेश्चूर्णितैरल्पसैन्धवैः। अव्यक्तेऽक्षिगदे कार्य प्लोतस्थैर्गुण्डनं बहिः ॥२॥ लेपाः। देवदारु, अतीस, व लोहके चूर्णमें थोड़ा सेंधानमक सैन्धवदारुहरिद्रागैरिकपथ्यारसाजनैः पिष्टैः । मिला कपड़े में बाहर रगड़ना चाहिये जबतक नेत्ररोगका पूर्व दत्तो बहिः प्रलेपो भवत्यशेषाक्षिरोगहरः॥९॥ रूप हो ॥३॥ तथा शारवकं लोधं घृतभृष्टं बिडालकः । घतभ्रष्टहरीवक्या तद्वत्कार्यो बिडालकः ॥१०॥ लंघनप्राधान्यम्। शालाक्येऽणोहिलेंपो बिडालक उदाहृतः। आक्षिकुक्षिभवा रोगाः प्रतिश्यायव्रणवराः। । गिरिच्चन्दननागरखटिकांशयोजितो बहिलेपः ११ पञ्चैते पञ्चरात्रेण प्रशमं यान्ति लघनात ॥३॥ कुरुते वचया मिश्री लोचनमगदंन सन्देहः ॥१२॥ नेत्र और पेटके रोग, जुखाम, व्रण और ज्वर ये पांचों रोग भूम्यामलकी घष्टा सैन्धवगृहवारियोजिता ताने। संपन करनेसे पांच रात्रिमें ही शान्त हो जाते हैं ॥३॥ | याता घनत्वमक्ष्णोजेयति बहिर्लेपतः पाडाम्॥१३॥ अथ नेत्ररोगाधिकारः।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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