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________________ (२५०) चक्रदत्तः। [मुखरोगा - --- -- तेन काथेन मतिमस्तिलस्यार्धाढकं शनैर्विपचेत् । । मौलसिरीके फल, लोध, हडजोड़, कटसैला, अमलतास,बबूल, कल्कैरक्षसमांशैर्मजिष्ठालोध्रमधुकानाम् ॥ १०१॥ - राल, दुर्गंधि कत्था व बिजैसारके क्वाथ, व कल्कसे सिद्ध तैलको इरिमेदखदिरकट्फललाक्षान्यग्रोधमुस्तसूक्ष्मैला । मुखम रखनेसे दांत स्थिर होते हैं । तथा इस क्वाथसे धोनेसे भी कर्पूरागुरुपद्मकलवङ्गकंकोलजातीनाम् ॥ १०२॥ । दांत मजबूत होते हैं ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ पतङ्गकोषगरिकवराङ्गगजकुसुमधातकीनां च ।। वदनसौरभदा गुटी। सिद्ध भिषग्विदध्यादिदं मुखोत्थेषु रोगेषु ॥ १०३ ।। एलालतालवनिकाफलशीतोष. परिशीर्णदन्तविद्रधिशैशिरशीताददन्तहर्षेषु । * कोलद्विकानि खदिरस्य कृते कषाये । क्रिमिदन्तदारणचलितप्रदुष्टमांसावशीर्णेषु । तुल्यांशकानि दशभागमिते निधाय मुखदौर्गन्ध्ये कार्य प्रागुक्तेष्वामयेषु तैलभिदम्।।१०४॥ प्रोद्भिन्नकैतकपुटे पुटवद्विपाच्य ॥१०१॥ नई दुर्गन्धित खैरकी छाल ५ सेर, जल २५ सेर ४८ तो. प्रागंशतुल्यशशिनामितमेकसंघं मिला पका चतुर्थाश शेष रहने पर उतार छान क्वाथमें ३ पिष्ट्वा नवेन सहकाररसेन हस्तौ । सेर १६ तो तैल तथा मजीठ, लोध, मौरेठी, इरिमेद ( दुर्ग- लिप्त्वा यथाभिलषितां गुडिकां विदध्यात् न्धितखैर ) खैर, कैफरा, लाख, बरगदकी छाल, नागरमोथा, स्त्रीपुंसयोर्वदनसौरभबन्धुभूताम् ॥ १११॥ छोटी इलायची, कपूर, अगर, पद्माख, लवंग कंकोल, जायफल, रक्तचन्दन, जावित्री, गेरू दालचीनी तथा धायके फूल प्रत्येक इलायची, लताकस्तूरिकाके बीज, लवंग, जावत्री छोटे बड़े एक तोलाका कल्क छोड़कर सिद्ध तैलका वैद्यको मुखरोगों में प्रयोग बेर सब समान भाग दशभाग कत्थेके काथमें खिले केवड़ाके करना चाहिये । तथा गिरते हुए दांतों, विद्राध, शैशिर, शीताद. फूलके अन्दर रख विधिपूर्वक पकाकर पूबै अंशके बराबर ही दन्तहर्ष, क्रिमिदन्त, दारुण, चल दन्त, दूषितमांसके कटनेमें | तिसा (१ भाग) कपूर मिलाकर पीसना चाहिये, फिर आमके रसको मुखकी दुर्गन्धिमें तथा और कहे हुए रोगोंमें इसका प्रयोग|| | हाथों में लेपकर गोली बना लेनी चाहिये। यह स्त्री व पुरुषके करना चाहिये ॥१००-१०४॥ मुखको सुगन्धित करती है ॥ ११०॥ १११॥ लाक्षादितैलम् । लघुखदिरवटिका। तैलं लाक्षारसं क्षीरं पृथक्प्रस्थं समं पचेत् । । खदिरस्या तुला सम्यग्जलद्रोणे विपाचयेत् । चतुर्गुणेऽरिमकाथे द्रव्यैश्च पलसंमितैः ॥ १०५॥ शेषेऽष्टभागे तत्रैव प्रतिवापं प्रदापयेत् ॥ ११२॥ लोधकट्फलमंजिष्ठापद्मकेशरपद्मकैः । जातीकर्पूरपूगानि ककोलफलकानि च । चन्दनोत्पलयष्टयाद्वैस्तैलं गण्डूषधारणम् ॥ १०६॥ इत्येषा गुडिका कार्या मुखसौभाग्यवर्धिनी । दालनं दन्तचालं च हनुमोक्षं कपालिकाम् । दन्तोष्ठमुखरोगेषु जिह्वाताल्वामयेषु च ॥ ११३ ॥ शीतादं पूतिवक्रं च ह्यरुचिं विरसास्यताम् । कत्था ५ सेर, जल २५ सेर ४८ तो. मिलाकर पकाना हन्यादास्यगदानेतान्कुर्याहन्तानपिस्थिरान्॥१०७॥ चाहिये, अष्टमांश रहनपर जावित्री, कपूर सुपारी, कंकाल प्रत्येक तेल, लाखका रस, दूध प्रत्येक १ प्रस्थ (१से. ९ छ.३/४ तोला चूर्णको छोड़कर गोली बना लेनी चाहिये । यह मुखको तो०) दुर्गन्धित कत्थेका काथ६सेर ३२ तो और लोध कैफरा | सुगन्धित करती तथा दन्त, ओष्ठ, मुख, जिला व तालुरोगोंको मजीठ, कमलका केशर, पद्माख, चन्दन, नीलोफर, मौरेठी/ नष्ट करता है॥ ११२॥ ११३॥ प्रत्येक ४ तोलेका कल्क छोड़कर सिद्ध तैल गण्डूष धारण कर बृहत्खदिरगुटिका। नेसे फटना, दन्त हिलना, हनुमोक्ष, कपालिका, शीताद, मुखदुर्गन्धि, अरुचि, बिरसता इन मुखरोगोंको नष्ट करता तथा गायत्रिसारतुलयेरिमवल्कलानां दांतोंको दृढ करता है ॥ १०५-१०७॥ __सार्ध तुलायुगलमम्बुघटेश्चतुर्भिः । निष्क्वाथ्य पादमवशिष्टसुवस्त्रपूतं बकुलादितैलम् । भूयः पचेदथ शनैर्मृदुपावकेन ॥ ११४ ॥ बकुलस्य फल लो वज्रवल्ली कुरुण्टकम् । तस्मिन्घनत्वमुपगच्छति चूर्णमेषां चतुरगुलवव्वोलवाजिकर्णेरिमाशनम् ॥ १९८॥ लक्ष्णं क्षिपेच्च कवलपहभागिकानाम् । एषां कषायकल्काभ्यां तैलं पकं मुखे धृतम् । । एलामृणालसितचन्दनचन्दनाम्बुस्थैर्य करोति चलतां दन्तानां धावनेन च ॥१०९।। श्यामातमालविकषाघनलोहयष्टी॥११५॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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