SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 271
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (२४४) चक्रदत्तः। मुखरोगा शीताद नामके दन्तरोगमें, रक्तको निकालकर जलके लगाना चाहिये और गण्डूष धारणके लिये क्षीरी वृक्षांक साथ सोंठ, सरसों और त्रिफलाका क्वाथ कर गण्डूष | कषायमें शहद, घी व शक्कर मिलाकर प्रयोग करना धारण करना चाहिये । तथा प्रियंगु त्रिफला और मोथाका लेप | चाहिये ॥१५-१७ ॥ करना चाहिये ॥९॥१०॥ शैशिरचिकित्सा। रक्तस्त्रावचिकित्सा। शशिरे हृतरक्ते च लोध्रमुस्तरसाजनैः । कुष्ठं दावर्मिन्दलोभ्रं समंगा सक्षौद्रैः शस्यते लेपो गण्डूषे क्षीरिणो हिताः॥१८॥ पाठा तिक्ता तेजनी पीतिका च । दांतोंके शैशिररोगमें रक्त निकालकर शहदके साथ लोष, चूर्ण शस्तं घर्षणं तद्विजानां नागरमोथा और रसौंतका लेप करना चाहिये और दूधवाले रक्तस्रावं हन्ति कण्डूं रुजां च ॥ ११॥ वृक्षोंका गंडूष धारण करना चाहिये ॥१८॥ कूठ, दारुहल्दी, नागरमोथा, लोध, लज्जालु, पाठ, कुटकी, परिदरोपकुशचिकित्सा। चव्य तथा हल्दीके चूर्णको दांतोंमें घिसनेसे रक्तस्राव, खुजली व क्रियां परिदरे कुर्याच्छीतादोक्तां विचक्षणः । पीड़ा नष्ट होती है ॥ ११॥ संशोध्योभयतः कार्य शिरश्चोपकुशे ततः ॥ १९ ॥ चलदन्तस्थिरीकरणम् । काकोदुम्बारिकागोजीपत्रैविस्रावयेद् भिषक् । चलदन्तस्थिरकर कार्य बकुलचर्वणम् । क्षौद्रयुक्तैश्च लवणैः सव्योषैः प्रतिसारयेत् ॥२०॥ आर्तगलदलक्काथगण्डूषो दन्तचालनुत् ॥१२॥ पिप्पल्यः सर्षपाः श्वेता नागरं नैचुलं फलम् ।। दन्तचाले हितं श्रेष्ठं तिलोपाचर्वणं सदा । सुखोदकेन संगृह्य कवलं तस्य योजयेत् ॥ २१ ॥ दन्तपुप्पुटके कार्य तरुणे रक्तमोक्षणम् ॥ १३ ॥ परिदरमें शीतादोक्त चिकित्सा करनी चाहिये । तथा उपकुशमें सपश्चलवणः क्षारः सक्षौद्रः प्रतिसारणम् । वमन, विरेचन तथा नस्यसे शोधन कर कठूमर या गोजिह्वाके दन्तानां तोदहर्षे च वातघ्नाः कवला हिताः ॥१४॥ | पत्तोंसे खुरच कर रक्त निकालना चाहिये । फिर शहदमें त्रिकटु और पांचों नमकोंको मिलाकर लगाना चाहिये । तथा छोटी दन्तचाले तु गण्डूषो बकुलत्वक्कृतो हितः । पीपल, सरसों, सोंठ व समुद्रफलको गुनगुने जलमें मिलाकर कवल मौलसिरीकी छालको चाबना हिलते दाँतोंको मजबूत धारण कराना चाहिये ॥ १९-२१॥ करता है । तथा नीले कटसैलेकी पत्तीके क्वाथका गण्डष धारण करनेसे दाँतोंका हिलना बन्द होता है तथा दाँतोंके दन्तवैदर्भचिकित्सा । हिलनमें तिल व बचको चबाना हितकर है। नवीन दन्त | शस्त्रेण दन्तवैदर्भ दन्तमूलानि शोधयेत् । पुप्पुटकमें रक्तमोक्षण करना चाहिये । तथा पांचों नमक और ततः क्षारं प्रयुजीत क्रियाः सर्वाश्च शीतलाः२२॥ क्षारके चूर्णको शहद मिलाकर लगाना चाहिये । दाँतोंके दर्द व दन्तवैदर्भमें शस्त्रसे दन्तमूलको शोध कर क्षार लगाना गुंठलानेमें वातनाशक कवल हितकर है । तथा दांतोंके हिलनेमें | चाहिये । तथा समस्त शीतल चिकित्सा करनी चाहिये ॥२२॥ मौलसिरीकी छालके क्वाथका गण्डूष धारण करना चाहिये ॥ १२-१४॥ अधिकदन्ताचेकित्सा। उद्धृत्याधिकदन्तं तु ततोऽग्निमवचारयेत् । ‘दन्तशूलचिकित्सा। क्रिमिदन्तकवचात्र विधिः कार्यों विजानता ॥२३॥ माक्षिकं पिप्पलीसर्पिमिश्रितं धारयेन्मुखे ॥ १५॥ अधिक दांतको उखाड़ कर अग्निसे जला देना चाहिये दन्तशलहरं प्रोक्त प्रधानमिदमौषधम । | तथा इसमें क्रिमिदन्तके समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥२३॥ विस्राविते दन्तवेष्टे व्रणं तु प्रतिसारयेत् ॥ १६ ॥| अधिमांसचिकित्सा। लोध्रपत्तंगमधुकलाक्षाचूणैर्मधूत्तरैः। . गण्डूषे क्षीरिणो योज्याः सक्षौद्रघृतशर्कराः ॥१७॥ छित्त्वाऽधिमांसं सक्षौरेतेश्चूर्णेरुपाचरेत् । शहद, छोटी पीपल व घीको मिलाकर मुखमें रखना | पाठावचातेजोवतिसर्जिकायावशूकजैः । चाहिये । यह दन्तशूलको नष्ट करनेमें प्रधान औषधि है।। क्षीद्रद्वितीयाः पिप्पल्यः कवलश्चात्र कीर्तितः॥२४॥ तथा दन्तवेष्टके रक्तको निकालकर घावमें लोध, पीला। पटोलानम्बात्रफलाकषायश्चात्र धाबने । बन्दन, मौरेठी व लाखके चूर्णको शहद मिलाकर | शिरोविरेकश्च हितो धूमो वैरेचनश्च यः ॥ २५ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy