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________________ ( २४० ) चक्रदत्तः । त्रिफलाका चूर्ण, जटामांसी, भांगरा, नीलोफर, शारिवा तथा सेंधानमकसे सिद्ध तैल रूक्षिका फिहासको नष्ट करता है ॥ ८२ ॥ चित्रका दितैलम् | चित्रकं दन्तिमूलं च कोषातकीसमन्वितम् । कल्कं पिष्ट्वा पचेत्तैलं केशददुविनाशनम् ॥ ८३ ॥ चीतकी जड़, दन्तीकी जड़, तथा कडुई तोरईका कल्क छोड़कर सिद्ध तैल बालोंके दादको नष्ट करता ॥ ८३ ॥ गुञ्जातैलम् । गुफलैः शृतं तैलं भृङ्गराजरसेन तु । कण्डूदारुणहृत्कुष्ठकपालव्याविनाशनम् ॥ ८४ ॥ गुजा कल्क और भांगरेके रससे सिद्ध तैल खुजली, दारुण, कुष्ठ और कपाल व्याधिको नष्ट करता है ॥ ८४ ॥ भृंगराजतैलम् । भृङ्गरजस्त्रिफलोत्पलशारि लोहपुरीषसमन्वितकारि । तैलमिदं पच दारुणहारि कुञ्चितकेशघनस्थिरकारि ।। ८५ ।। भांगरा, त्रिफला, नीलोफर, सारिवा, लोहकि इन सबके कल्कमें तैलको छोड़कर पकाना चाहिये । यह दाहणको नष्ट करता तथा बालोंको घन, स्थिरं तथा घुंघुराले बनाता है ॥ ८५ ॥ [ क्षुद्ररोगा अवगाढपदं चैव प्रच्छायेत्वा पुनः पुनः । गुफलैचिरं लिम्पेत्केशभूमिं समन्ततः ॥ ९१ ॥ हस्तिदन्तमसीं कृत्वा मुख्यं चैव रसाञ्जनम् । लोमान्यनेन जायन्ते नृणां पाणितलेष्वपि ॥ ९२ ॥ भल्लातक बृहतीफलगुञ्जामूलफलेभ्य एकेन । मधुसहितेन विलिप्तं सुरपतिलुप्तं शमं याति ॥ ९३ ॥ बृहतीफलरसपिष्टं गुञ्जाफलमूलं चेन्द्रलुप्तस्य । कनकनिघृष्टस्य सतो दातव्यं प्रच्छितस्य सदा ९४ ॥ घृष्टस्य कर्कशैः पत्रैरिन्द्रलुप्तस्य गुण्डनम् । चूर्णितैर्मरिचैः कार्यमिन्द्रलुप्रनिवारणम् ॥ ९५ ॥ इन्द्रलुप्तचिकित्सा | मालतीकरवीराग्निनक्तमालविपाचितम् ॥ ८७ ॥ तैलमभ्यञ्जने शस्तमिन्द्रलुप्तापहं परम् । इदं हि त्वरितं हन्ति दारुणं नियतं नृणाम् ॥ ८८ ॥ धात्र्याश्रमज्जले पात्स्यात्स्थिरता स्रिग्धकेशता । इन्द्रलुप्ते शिरां विद्ध्वा शिलाकासीसतुत्थकैः ८९ ॥ लेपयेत्परितः कल्कैस्तैलं चाभ्यञ्जने हितम् । कुटन्नटशिखीजाती करञ्जकरवीरजेः ॥ ९० ॥ मालती, कनेर, चीतकी जड़ तथा कजासे सिद्ध तैलकी मालिश करनेसे इन्द्रलुप्त नष्ट होता है । यह तैल दारुणको शीघ्र ही नष्ट करता है । इसी प्रकार आंवला और आमकी गुठलीका लेप करनेसे बाल मजबूत तथा चिकने होते हैं । इन्द्र लुप्तमें शिराव्यध कर मैनारील, कसीस और तूतियाका लेप करना चाहिये । तथा केवटी मोथा, लटजीरा, चमेली, कजा व कनेरसे सिद्ध तेल लगाना चाहिये । तथा गाढ़ पछने लगाकर बार बार गुजाफलका लेप करना चाहिये । हाथीदांतकी भस्म बना रसाञ्जन | मिला लगाने से हाथ के तलुओं में भी बाल जमते हैं । भिलावां, बड़ी कटेरीका फल, गुञ्जाकी जड़ अथवा फल इनमें से किसी एकको शहद मिलाकर लेप करनेसे इन्द्रलुप्त नष्ट होता है । सुवर्णद्वारा खुरचे अथवा पछने लगाये इन्द्रलुप्त ( बालोंके गिरने, ) में बड़ी कटेरीके रसमें पसि गुञ्जामूल व फलको लगानेसे इन्द्रलुप्त नष्ट होता है । अथवा कड़े पत्तोंसे खुरचकर काली मिर्चका चूर्ण उरोनेसे इन्द्रलुप्त नष्ट होता है ॥ ८७-९५ ॥ छागक्षीरादिलेपद्वयम् । प्रतिमर्शतैलम् । प्रपौण्डरीकमधुकपिप्पलीचन्दनोत्पलैः । कार्षिकैस्तैलकुडवं तैर्द्विरामलकीरसः ॥ ८६ ॥ साध्यः स प्रतिमर्शः स्यात्सर्वशीर्षगदापहः । पुण्डरिया, मौरेठी, छोटी पीपल, चन्दन व नीलोफर प्रत्येक एक तोला, तैल १६ तोला तथा आंवलेका रस ३२ तोला मिलाकर पकाना चाहिये । इस प्रतिमर्शका नस्य लेनेसे समस्त शिरोरोग नष्ट होते हैं ॥ ८६ ॥ छागक्षीररसाञ्जनपुटदग्धगजेन्द्रदन्तमसिलिप्ताः । | जायन्ते सप्तरात्रात् खल्ल्यामपि कुश्विताश्चिकुराः ॥९६ मधुकेन्दीवर मूर्वातिलाज्यगोक्षीरभृङ्गलेपेन । अचिराद्भवन्ति केशा घनदृढमूलायता ऋजवः ॥९७॥ | बकरीका दूध, रसौत पुटमें जलाई हाथीदांतकी स्याहीका लेप करनेसे ७ दिनमें खल्वाटके भी घन केश उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार मौरेठी, नीलोफर, मूर्वा, तिल, घी, गायका दूध, भांगरा इनका लेप करनेसे बाल घने, दृढ़मूल, लम्बे तथा सीधे होते हैं ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ स्नुह्याद्यं तैलम् । स्नुहीपयः पयोऽर्कस्य मार्कवो लाङ्गलीविषम् । मूत्रमाजं सगोमूत्रं रक्तिका सेन्द्रवारुणी ।। ९८ ।। सिद्धार्थ तीक्ष्णतैलं च गर्भ दत्त्वा विपाचितम् । वह्निना मृदुना पक्कं तैलं खालित्यनाशनम् ॥ ९९ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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