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________________ ( १२२ ) चक्रदत्तः । वर्दस्तुरङ्गो वा गजो वा वायुपीडितः । एभिरभ्यञ्जनैर्गाढं भवेन्मारुतविक्रमः ॥ १४८ ॥ काली मिर्च, निसोथ, दन्ती, आकका दूध, गोबरका रस, देवदारु, हल्दी, दारूहल्दी, जटामांसी, कूठ, चन्दन, इन्द्रायण, कनेरकी छाल, हरताल, मैनशिल, चीतकी जड़, कलिहारी, वायविडंग, चकवड़के बीज, सिरसेकी छाल, कुरैयेकी छाल, नीमकी छाल, सतौना, हुण्ड, गुर्च, अमलतास के पत्ते, कजा, नागरमोथा, कथा, छोटी पीपल, दूधिया बच, तथा मालकांगनी प्रत्येक ४ तोला, सांगिया ८ ताला, कडुआ तैल १ आढ़क (द्रवद्वैगुण्यकर ६ सेर ३२ तोला ) गोमूत्र २५ सेर ४८ तोला छोड़कर मिट्टी या लोहके पात्रमें मन्द आचसे पकाना चाहिये । इस उत्तम तैलको कुष्ठवालोंके व्रणोंमें लगाना चाहिये । इससे पामा, बिवाई, दाद, खुजली, फफोले, झुर्रियां, बालोंकी सफेदी, उहां तथा झांई नष्ट होते हैं और शरीर सुन्दर होता है । जिन स्त्रियोंको छोटी अवस्थामें इस तैलका नस्य दिया जाता है, उनके बहुत बुढापामें भी स्तन कड़े बने रहते हैं । वायुसे पीड़ित बैल घोड़ा अथवा हाथी इसकी मालिशसे वायुके समान वेगवाला होता हैं ॥ १४१-१४८ ॥ विषतैलम् । नक्तमालं हरिद्रे द्वे अर्कस्तगरमेव च । करवीरं वचा कुष्ठमास्फोता रक्तचन्दनम् ॥ १४९॥ मालती सप्तपर्ण च मञ्जिष्ठा सिन्धुवारिका । एषामर्धपलान्भागान्विषस्यापि पलं तथा ॥ १५० ॥ चतुर्गुणे गवां मूत्र तैलप्रस्थं विपाचयेत् । श्वित्रविस्फोटाकेटिभकीटलूताविचर्चिकाः ॥ १५१ ॥ कण्डूकच्छ्रविकाराश्च ये व्रणा विषदूषिताः । विषतैलमिदं नाम्ना सर्वत्रणविशोधनम् ॥ १५२ ॥ कञ्ज, हल्दी, दारूहल्दी, आक, तगर, कनेर, बच, कूठ, आस्फोता, लालचन्दन, चमेली, सतौना, मञ्जीठ तथा सम्भालू प्रत्येक २ तोला, सींगिया ४ तोला, तैल एक प्रस्थ, ( द्रवद्वैगुण्यसे १ सेर ९ छ. ३ तोला ) चतुर्गुण गोमूत्र मिलाकर पकाना चाहिये । इस तैलसे सफेद कुष्ठ, फफोले, किटिभ, कीट, मकडीका विष, विचर्चिका, खुजली, कच्छू तथा विषसे दूषित व्रण नष्ट होते हैं । यह “ विषतैल " समस्त व्रणोंको शुद्ध करता है ।। १४९- १५२ ॥ करवीराद्यं तैलम् । श्वेतकरवीरकरसो गोमूत्रं चित्रकं विडङ्गं च । कुष्ठेषु तैलयोग: सिद्धोऽयं संमतो भिषजाम् १५३ ॥ सफेद कनेरका रस, गोमूत्र, चीतकी जड़ और वायबिडंग, मिलाकर विधिपूर्वक सिद्ध तेल सब कुष्ठों को नष्ट करने बाला है, ऐसा वैद्यलोग बताते हैं ॥ १५३ ॥ [ कुष्ठा अपरं करवीराद्यं तैलम् | श्वेतकर वीरमूलं विषांशसाधितं गवां मूत्रे । चर्मदल सिध्मपामाविस्फोटक्रिमिकिटिभजित्तैलम् १५४ सफेद कनेरकी जड़ और सीगियाका कहक तथा गोमूत्र मिलाकर सिद्ध तेल चर्मदल, खुजली, सिघ्मकुष्ठ, फफोले, कीड़े और किटिभ कुष्ठको नष्ट करता है ॥ १५४ ॥ सिन्दूराद्यं तैलम् । सिन्दूरार्धपलं पिष्ट्ा जीरकस्य पलं तथा । कटुतैलं पचेन्मानीं सद्यः पामाहरं परम् ॥ १५५ ॥ सिन्दूर २ तोला, जीरा ४ तोला, कडुआ तैल ३२ तोला मिला पकाकर लगानेसे तत्काल खुजली नष्ट होती है ॥ १५५ ॥ महासिन्दूराद्यं तैलम् । सिन्दूरं चन्दनं मांसीविडङ्गं रजनीद्वयम् । प्रियं पद्मकं कुष्ठं मञ्जिष्ठां खदिरं वचाम् ॥ १५६ जात्यर्कत्रिवृतानिम्बकरञ्जविषमेव च । कृष्णवेत्रकलोध्रं च प्रपुन्नाडं च संहरेत् ॥ १५७ ॥ लक्ष्णपिष्टानि सर्वाणि योजयेत्तैलमात्रया । अभ्यङ्गेन प्रयुंजीत सर्वकुष्ठविनाशनम् ॥ १५८ ॥ पामाविचर्चिकाकण्डूविसर्पादिविनाशनम् । रक्तपित्तोत्थितान्हन्ति रोगानेवंविधान्बहून् ॥ १५९ सिन्दूर, चन्दन, जटामांसी, वायविडंग, हल्दी, दारूहल्दी फूलप्रियङ्गु, पद्माख, कूठ, मञ्जीठ, कत्था, वच, चमेली, आक, निसोथ, नीमकी छाल, कजा, सींगिया, काला वेत, लोध तथा पवाड़ के बीज सबको महीन पीस तैल मिलाकर पकाना चाहिये । इसकी मालिश करनेसे समस्त कुष्ठ, पामा, विचर्चिका, कण्डू, विसर्प तथा रक्तपित्त रोग नष्ट होते हैं ॥ १५६-१५९ ॥ आदित्यपाकं तैलम् । मञ्जिष्ठा त्रिफलालाक्षानिशा गन्धारीलालकैः । चूर्णितेस्तैलमादित्यपाकं पामाहरं परम् ॥ १६० ॥ मजीठ, त्रिफला, लाख, हल्दी, मनशिल, तथा गन्धकका चूर्ण कर तैल मिला सूर्य की किरणोंसे ( ७ दिनतक ) पकाना चाहिये । यह तैल पामाको नष्ट करता है ॥ १६० ॥ दूर्वाद्यं तैलम् । स्वरसे चैव दूर्वायाः पचेत्तैलं चतुर्गुणे । कच्छू विचर्चिकापामा अभ्यङ्गादेव नाशयेत् १६१॥ दूब स्वरसमें चतुर्थांश तेल मिला पकाकर मालिश करनेसे कच्छ, बिवाई और पामा नष्ट होती है ॥ १६१ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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