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________________ (२०८) चक्रदत्तः। [ उपदंशा च्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न् निशार्य तैलम् । . पैत्तिके लेपः। निशार्कक्षीरसिंध्वग्निपुराश्वहनवत्सकैः । गैरिकाजनमन्जिष्ठामधुकोशीरपद्मकैः। सिद्धमभ्यखने तेलं भगन्दरविनाशनम् ॥२६ ॥ सचन्दनोत्पले: स्निग्धैः पैत्तिकं संप्रलेपयेत ॥५॥ हल्दी, आकका दूध, सेंधानमक, चीतकी जड़, गुग्गुल, गेरू, सुरमा, मीठ, मौरेठी, खश, पद्माख, चन्दन, तथा कनैर तथा कुटजके कल्कसे सिद्ध तेल अभ्यञ्जनद्वारा भगन्दरको नीलोफरको पीस स्नेह मिलाकर लेप करना चाहिये ॥५॥ नष्ट करता है ॥२६॥ पित्तरक्तजे। वानि । निम्बार्जुनाश्वत्थकदम्बशालजम्बूवटोदुम्बरवेतसेषु । व्यायाम मैथुनं युद्धं पृष्ठयानं गुरूणि च । प्रक्षालनालेपघृतानि कुर्याच्चूर्णानि पित्तास्रभवोपदंशे।६ संवत्सरं परिहरेदुपरूढव्रणो नरः ॥२७॥ | नीम, अर्जुन, पीपल, कदम्ब, शाल, जामुन, बरगद, | गूलर, वेतस इनके चुणोंसे पित्तरक्तके उपदंशमें प्रक्षालन व व्यायाम, मैथुन, युद्ध, घोड़े आदिकी पीठकी सवारी तथा| था लेप हितकर है। तथा इन औषधियोंके काथमें सिद्ध घृत सबमें गुरु द्रव्यका घाव भर जानेके अनन्तर १ वर्षतक सेवन न| नहितकर है॥६॥ करना चाहिये ॥२७॥ इति भगन्दराधिकारः समाप्तः। प्रक्षालनम् । त्रिफलायाः कषायेण भृङ्गराजरसेन वा । अथोपदंशाधिकारः। व्रणप्रक्षालनं कुर्यादुपदंशप्रशान्तये ॥७॥ त्रिफलाके क्वाथ अथवा भांगरेके रससे उपदंशत्रणको धोना चाहिये ॥७॥ सामान्यक्रमः। स्निग्धस्क्निशरीरस्य ध्वजमध्ये शिराव्यधः । त्रिफलामसीलेपः। जलोकः पातनं वा स्यादूर्वाधः शोधनं तथा ॥१॥ दहेत्कटाहे त्रिफलां समांशां मधुसंयुताम् । उपदंशे प्रलेपोऽयं सद्यो रोपयति व्रणम् ॥८॥ सद्यो निर्हतदोषस्य रुक्शोथावुपशाम्यतः। । कड़ाहीमें त्रिफला जला समभाग शहद मिलाकर लेप पाको रक्ष्यः प्रयत्नेन शिश्नक्षयकरो हि सः॥२॥ स्नेहन स्वेदन कर लिङ्गमें शिराव्यध करना चाहिये । अथवा करनेसे उपदंशका घाव शीघ्र ही भर जाता है ॥ ८॥ जोंक लगाना चाहिये। तथा वमन, विरेचन कराना चाहिये। रसाञ्जनलेपः। प्रयत्नपूर्वक पकनेसे रोकना चाहिये। क्योंकि पकनेसे लिअक्षय रसाजनं शिरीषेण पध्यया वा समन्वितम् । हो जाता है॥१॥२॥ सक्षौद्रं वा प्रलेपेन सर्वलिंगगदापहम् ॥९॥ पटोलादिकाथाः। . रसातको शिरीषकी छाल अथवा छोटी हर्रके चूर्ण अथवा पटोलनिम्बत्रिफलागुडूची | शहद मिलाकर लेप करनेसे लिंगके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥९॥ क्वार्थ पिबेद्वा खदिराशनाभ्याम् । सगुग्गुलु वा त्रिफलायुतं वा बब्बूलदलादियोगाः। सॉपदंशापहराः प्रयोगाः॥३॥ बब्बूलदलचूर्णेन दाडिमत्व डिमत्वग्भवेन वा। परवलकी पत्ती, नीमकी छाल, त्रिफला तथा गुर्चके क्वाथ गुण्डनं त्रस्थिचूर्णेन उपदंशहरं परम् ॥१०॥ अथवा कत्था व विजैसारके क्वाथमें गुग्गुल अथवा त्रिफलाचूर्ण बबूलकी पत्तीका चूर्ण अथवा अनारके छिल्केका चूर्ण अथवा डालकर सेवन करनेसे समस्त उपदंश नष्ट होते हैं ॥३॥ मनुष्यकी हड्डीका चूर्ण उर्रानेसे उपदंश नष्ट होता है ॥१०॥ वातिके लेपसेको। सामान्योपायाः। प्रपौण्डरीकं मधुकं रास्ना कुष्ठं पुनर्नवा । लेपः पूगफलेनाश्वमारमूलेन वा तथा। सरलागुरुभद्राद्वैर्वातिके लेपसेचने ॥४॥ सेवेन्नित्यं यवान्नं च पानीयं कौपमेव च ॥ ११ ॥ पुण्डरिया, मोरेठी, रासन, कूठ, पुनर्नवा, सरल, अगर व सुपारीके फल अथवा कनेरकी जड़का लेप करना चाहिये देवदारसे वातजमें लेप तथा सेक करना चाहिये ॥४॥ तथा यवके पदार्थ और कुएँका जल पीना चाहिये ॥११॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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