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________________ (२०५) चक्रदत्तः। (नाडीव्रणा मञ्जिष्ठाचं घृतम्। रोमसञ्जननो लेपः। मजिष्ठां चन्दनं मूळ पिष्ट्वा सपिर्विपाचयेत् । चतुष्पदा हि त्वग्रोमखुरशृङ्गास्थिभस्मना । सर्वेषामग्निदग्धानामेतद्रोपणमिष्यते ॥ ९१॥ | सैलाक्ता चूर्णिता भूमिर्भवद्रोमवती पुनः ॥ ९८॥ मजीठ, चन्दन, तथा मुर्वाके कल्कसे सिद्ध घृत समस्त | चौपायोंकी खाल, रोम, खुर, शृंग और हड्डियोंकी भस्मअग्निसे जले हुए धावोंके लिये लाभदायक होता है ॥५१॥ को तैलमें मिलाकर लगानेसे व्रणवाले स्थानपर रोम जम पाटलीतैलम् । जाते हैं ॥ ९८ ॥ सिद्धं कषायकल्काभ्यां पाटल्याः कटुतैलकम् । । व्रणग्रन्थिचिकित्सा। दग्धव्रणरुजानावदाहविस्फोटनाशनम् ॥ ९२ ॥ | व्रणग्रन्थि प्रन्थिवश्च जयेत्क्षारेण वा भिषक् ॥१९॥ घावकी गांठकी चिकित्सासे अथवा प्रयोगसे व्रणप्रन्थिको शान्त पाढ़लके काथ व कल्कसे सिद्ध कडुआ तैल जले व्रणोंकी | करना चाहिये ॥१९॥ पीड़ा, स्राव, जलन व फफोलोंको नष्ट करता है ॥ ९२॥ | इति व्रणशोथाधिकारः समाप्तः। चन्दनायं यमकम् ।। चन्दनं वटशङ्ख च मञ्जिष्ठा मधुकं तथा। अथ नाडीव्रणाधिकारः। प्रपौण्डरीकं मूर्वा च पतङ्गं धातकी तथा ॥ ९३ ॥ एभिस्तलं विपक्तव्यं सर्पिःक्षीरसमन्वितम् । आग्निदग्धव्रणेष्विष्टं म्रक्षणाद्रोपणं परम् ॥ ९४ ॥ नाडीव्रणचिकित्साक्रमः। चन्दन, वरगदके कोमल अंकुर, मजीठ, मौरेठी, पुण्ड-| नाडीनां गतिमन्विष्य शस्त्रेणापाटय कर्मवित् । रिया, मूर्वा, लाल चन्दन तथा धायके फूल इनका कल्क| सर्वव्रणक्रमं कुर्याच्छोधनं रोपणादिकम् ॥१॥ छोड़कर तैल, घी और दूध मिलाकर पकाना चाहिये। नाड़ी ( नासूर ) की गतिका पता लगा शस्त्रसे चीरयह स्नेह लगानेसे अग्निदग्धव्रण शीघ्र भर जाते हैं ॥कर शोधन तथा रोपणादि समस्त प्रणचिकित्सा करनी ॥९३ ॥९॥ चाहिये ॥१॥ मनःशिलादिलेपः। वातजचिकित्सा। मनःशिलाले मजिष्ठा सलाक्षा रजनीद्वयम् । | नाडी वातकृतां साधुपाटितां लेपयेद्भिषक् । प्रलेपः सघृतक्षौद्रस्त्वग्विशुद्धिकरः परः ॥ ९५ ॥ | प्रत्यक्पुष्पीफलयुतस्तिलैः पिष्टैः प्रलेपयेत् ॥२॥ मनशिल, हरताल, मजीठ, लाख, हल्दी व दारुहल्दी, इनका | बातज-नाडीको ठीक चीरकर लटजीराके फल और तिलको घी व शहदके साथ लेप त्वचाको शुद्ध करता है ॥ ९५॥ पीसकर लेप करना चाहिये ॥२॥ अयोरजआदिलेपः। पित्तकफशल्यचिकित्सा । पैत्तिकी तिलमखिष्ठानागदन्तीनिशायुगैः। अयोरजः सकाशीशं त्रिफलाकुसुमानि च । श्लैष्मिकी तिलयष्टयाह्वनिकुम्भारिष्टसैन्धवैः। प्रलेपः कुरुते काये सद्य एव नवत्वचि ॥ ९६॥ शल्यजां तिलमध्वाज्यैलेपयेच्छिन्नशोधिताम् ॥३॥ लोहचूर्ण, काशीस तथा त्रिफलाके फूलोंका लेप नवीन त्वचा-1 पित्तज-नासूरमें तिल, मजीठ, नागदमन, हल्दी तथा को काला करता है ॥ १६ ॥ दारुहल्दीको पीसकर तथा कफजमें तिल, मौरेठी, दन्ती, नीम तथा सेंधानमकको पीसकर लेप करे तथा शल्यजन्यको भी सवर्णकरणो लेपः। पूर्ववत् चीरकर तथा शोधन कर तिल, मधु और घृतसे लेप कालीयकलताम्रास्थिहेमकालारसोत्तमैः। करना चाहिये ॥३॥ लेपः सगोमयरसः सवर्णकरणः परः॥९७॥ दारुहल्दी, दूब, आमकी गुठली, नागकेशर, कालानिशोथ सूत्रवर्तिः। तथा रसौतका गोबरके रसके साथ लेप करनेसे त्वचा समान-| आरग्वधनिशाकालाचूर्णाज्यक्षौद्रसंयुता । वर्णवाली होती है ॥ ९७ ॥ सूत्रवर्तित्रणे योज्या शोधनी गतिनाशिनी ॥४॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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