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________________ (१९०) चक्रदत्तः। गलगण्डा उदावर्त, गुल्म, अर्श, प्लीहा, प्रमेह, ऊरुस्तम्भ, आनाह तथा लेपाः । पधरीको नष्ट करता है । इस तैल का अनुवासन करना चाहिये । तण्डुलोदकापिष्टेन मूलेन परिलेपितः । तथा सौरेश्वर घृतको बद और द्विरोगके नाशार्थ देना] हस्तिकर्णपलाशस्य गलगण्डः प्रशाम्यति ॥२॥ चाहिये ॥२६-२९॥ सर्षपाशिग्रुबीजानि शणबीजातसीयवान् । शतपुष्पाद्यं घृतम् । मूलकस्य च बीजानि तक्रेणाम्लेन पेषयेत् ॥३॥ गण्डानि ग्रन्थयश्चैव गलगण्डाः सुदारुणाः । शतपुष्पामृता दारु चन्दनं रजनीद्वयम् । जीरके द्वे बचानागात्रिफलागुग्गुलुत्वचः ॥३०॥ प्रलेपात्तेन शाम्यन्ति विलयं यान्ति चाचिरात् ॥४॥ मांसी कुष्ठं पत्रकैलारास्नाशृंगी: सचित्रकाः।। हस्तिकर्ण पलाशकी जड़को चावलके धोवनके साथ पीसकर क्रिमिनमश्वगन्धं च शैलेयं कटुरोहिणीम् ।। ३१॥ | लेप करनेसे गलगण्ड शान्त होता है। तथा सरसों, सहिजनके सैन्धवं तगरं पिष्ट्वा कुटजातिविष समे। | बीज, सन, अलसी, यव, तथा मूलीके बीजोंको खट्टे मटेके साथ एतैश्च कार्षिकैः कल्कैघृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥३२॥ पीसकर लेप करनेसे गण्ड, प्रन्थि तथा कठिन गलगण्ड शान्त होते हैं ॥२-४॥ वृषमुण्डितिकैरण्डनिम्बपत्रभवं रसम् । कण्टकार्यास्तथा क्षीरं प्रस्थं प्रस्थं विनिक्षिपेत्॥३३॥ नस्यम् । सिद्धमेतद् घृतं पीतमन्त्रवृद्धिमपोहति । जीर्णकर्कारुकरसो बिडसैन्धवसंयुतः। वातवृद्धिं पित्तवृद्धिं मेदोवृद्धिं च दारुणाम् ॥ ३४॥ नस्येन हन्ति तरुणं गलगण्डं न संशयः ॥ ५॥ मूत्रवृद्धिं श्लीपदं च यकृत्प्लीहानमेव च। । पकी कडुई तोम्बीका रस, बिडनमक तथा सेंधानमक मिला• शतपुष्पाघृतं रोगान्हन्यादेव न संशयः ॥ ३५॥ | कर नस्य लेनेसे नवीन गलगण्ड शान्त होता है ॥५॥ सौंफ, गुर्च, देवदारु, चन्दन, हल्दी, दारुहल्दी, सफेद | जलकुम्भीभस्मयोगः । जीरा, स्याह जीरा, बच, नागकेशर, त्रिफला, गुग्गुल, जलकुम्भीकजं भस्म पकं गोमूत्रगालितम् । दालचीनी, जटामांसी, कूठ, तेजपात, इलायची, रासन, पिबेत् कोद्रवभक्ताशी गलगण्डप्रशान्तये ॥६॥ काकड़ाशा, चातका जड़, वाचावडा, असगन्ध, छराला, जलकुम्भीकी भस्मको गोमूत्रमें मिला छानकर पीनेसे कुटकी, सेंधानमक, तगर, कुडेकी छाल, तथा अतीस तथा कोदयके भातका पथ्य लेनेसे गलगण्ड शान्त होता प्रत्येक एक तोलेका कल्क, घी १ सेर ९ छटाक ३ तोला|TMER तथा इतनी ही मात्रामें प्रत्येक अडूसेका स्वरस, मुण्डी, एरण्ड, नीमकी पत्ती तथा भटकटैयाका रस तथा दूध मिला उपनाहः। कर पकाना चाहिये । यह घृत पीनेसे वात वृद्धि, अन्त्रवृद्धि, सूर्यावर्तरसोनाभ्यां गलगण्डोपनाहने । पित्तद्धिं, दारुणमेदोवृद्धि, मूत्रद्धि, श्लीपद, यकृत्, तथा स्फोटासावैः शमं याति गलगण्डो न संशयः॥७॥ प्लीहा निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं । इसे " शतपुष्पाघृत सूर्यावर्त तथा लहसुनकी पुल्टिस बनाकर गलगण्डपर बान्धकहते हैं ॥३०-३५॥ नेसे फफोला पड़कर फूटता और बहता है । इससे गलगण्ड इति वृद्धयधिकारः समाप्तः। शान्त होता है । इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७॥ उषितजलादियोगौ। अथ गलगण्डाधिकारः। तिक्तालाबुफले पक्के सप्ताहमुषितं जलम् । मद्यं वा गलगण्डघ्नं पानात्पथ्यानुसेविनः ॥८॥ कर्डई तोम्बीके पके फलमें ७ दिन रक्खा गया जल पथ्यम् । | अथवा मद्य पीने तथा पथ्यसे रहनेसे गलगण्ड शान्त होता है॥८॥ यवमुद्रपटोलानि कटु रूक्षं च भोजनम् । छदि सरक्तमुक्तिं च गलगण्डे प्रयोजयेत् ॥१॥ अपरे योगाः। यव, मूंग, परवल, कडुआ, रूक्ष भोजन, वमन, तथा रक्त-/ कट्फलचूर्णान्तर्गलघर्षों गलगण्डमपहरति । मोक्षणका गलगण्डमें प्रयोग करना चाहिये ॥१॥ घृतमिश्र पीतमिव श्वेतगिरिकर्णिकामूलम् ।। ९॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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