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________________ ( १८६ ) पुनर्नवा, चीतकी जड़, देवदारु, पञ्चकटु, जवाखार और हर्रके कल्क और दशमूलके क्वाथसे सिद्ध घृत शोथको नष्ट करता है ॥ २७ ॥ पुनर्नवाशुण्ठीदशमूलघृते पुनर्नवाक्काथकल्कसिद्धं शोथहरं घृतम् । विश्वोषधस्य कल्केन दशमूलजले शृतम् । घृतं निहन्याच्छ्वयथुं ग्रहणीं पाण्डुतामयम् ॥ २८ ॥ पुनर्नवा के क्वाथ व कल्कसे सिद्ध घृत शोथको नष्ट करता 1 इसी प्रकार सोंठका कल्क और दशमूलका क्वाथ मिलाकर सिद्ध घृत सूजन, ग्रहणी तथा पाण्डुरोगको नष्ट करता है ॥ २८ ॥ 'चक्रदत्तः । चित्रकाद्यं घृतम् । सचित्रका धान्ययमानिपाठाः सदीप्यकत्र्यूषणवेतसाम्लाः । बिल्वात्फलं दाडिमयावशूकं सपिप्पलीमूलमथापि चव्यम् ॥ २९ ॥ पिवामात्राणि जलाढकेन पक्त्वा घृतप्रस्थमथोपयुञ्ज्यात् । अशसि गुल्माञ्छ्वयथुं च कृच्छ्रे निहन्ति वह्निं च करोति दीप्तम् ॥३०॥ चीतकी जड़, धनियां, अजवायन, पाढ़, अजमोद, त्रिकटु, अम्लवेत, बेलका गूदा, अनारदाना, यवाखार, पिपरामूल तथा चय, प्रत्येक १ तोलेका कल्क घी ६४ तोला तथा जल ३ सेर १६ तो० मिलाकर पकाना चाहिये । यह घी अर्श, गुल्म, शोथ व मूत्रकृच्छ्रको नष्ट करता तथा अभिको दीप्त करता है ।। २९-३० ॥ पञ्चकोलादिवृतम् । रसे विपाचयेत्सर्पिः पञ्चकोलकुलत्थयोः । पुनर्नवायाः कल्केन घृतं शोथविनाशनम् ॥ ३१ ॥ rasta और कुoria क्वाथ तथा पुनर्नवा के कल्से सिद्ध घृतशोथको नष्ट करता है ॥ ३१ ॥ 1 चित्रकघृतम् । क्षीरं घटे चित्रककल्क लिप्ते दध्यागतं साधु विमध्य तेन । तज्जं घृतं चित्रकमूलकल्कं तत्रेण सिद्धं श्वयथुन्नमध्यम् ॥ ३२ ॥ अर्शोऽतिसारानिलगुल्म मेहां [ शोथा मिलाकर सिद्ध करना चाहिये । यह घृत सूजनको तथा अर्श, अतिसार, वातगुल्म और प्रमेहको नष्ट करता और अग्निदीप्त करता है ॥ ३२-३३ ॥ माणकवृतम् । माणकक्काथकल्काभ्यां घृतप्रस्थं विपाचयेत् । एकजं द्वन्द्वजं शोथं त्रिदोषं च व्यपोहति ॥ ३४ ॥ माणके क्वाथ व कल्कसे सिद्ध किया गया घृत समस्त शोथोंको नष्ट करता है ॥ ३४ ॥ स्थलपद्मघृतम् । स्थलपद्मपलान्यष्टौ त्र्यूषणस्य चतुःपलम् । घृतप्रस्थं पचेदेभिः क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् । पञ्च कासान्हरेच्छीत्रं शोथं चैव सुदुस्तरम् ||३५|| स्थलपद्म ३२ तोला, त्रिकटु मिलित ४ पल ( १६ तोला ) घी १ प्रस्थ ( द्रवद्वैगुण्यकर १|| से० ८ तो० ) तथा घीसे चतुर्गुण दूध मिलाकर सिद्ध किये गये घृतका सेवन करने से पांचों कास तथा दुस्तर शोथ नष्ट होते हैं ॥ ३५ ॥ शैलेयाद्यं तैलं प्रदेोषा । शैलेयकुष्ठा गुरुदारुकौती त्व पद्मलांबु पलाशमुस्तेः । प्रियंगुणेयकममांसी तालीसपत्रप्लवपत्रधान्यैः ॥ ३६ ॥ श्रीवेष्टकध्यामकपिप्पलीभिः कानखैर्वापि यथोपलाभम् । वातान्वितेऽभ्यङ्गमुशन्ति तेलं सिद्धं सुपिष्टैरपि च प्रदेहम् ॥ ३७ ॥ छरीला, कूठ, अगर, देवदारु, सम्भालूके बीज, दालचीनी, पद्माख, इलायची, सुगन्धवाला, ढाकके फूल, मोथा, प्रियङ्गु, मालती के फूल, नागकेशर, जटामांसी, तालीशपत्र, केवटी मोथा, तेजपात, धनियां, गन्धा बिरोजा, रोहिष घास, छोटी पीपल, गठेउना तथा नख इनमेंसे जितने द्रव्य मिल सकें, उनसे सिद्ध तैलकी मालिश करनी चाहिये । तथा इन्हींको पीसकर लेप करना चाहिये ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ शुष्कमूलाद्यं तैलम् । स्तद्धन्ति संवर्धयतेऽनलं च ॥ ३३ ॥ शुष्कमूलक वर्षाभूदारुरास्नामहौषधैः । पक्कमभ्यञ्जनात्तैलं सशूलं श्वयथुं जयेत् ॥ ३८ ॥ सूखी मूली, पुनर्नवा, देवदारु, रासन, तथा सोंठके कल्कसे चीतके कल्कसे लिप्त थड़ेमें दूध जमाकर दही हो जा नेपर test निकाला गया घृत और वीतकी जड़का कल्क तथा मट्ठा | सिद्ध तैलकी मालिश करनेसे शुलयुक्त शोथ नष्ट होता है ॥ ३८ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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