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________________ - www-- (१८२) चक्रदत्तः। [प्लीहाचन्न्न्न् -www -m रोहीतककी छाल व बड़ी हर्रके छिल्कोंके चूर्णको गोमूत्र कर सिद्ध किया घृत यकृत् , प्लीहा और उदररोगोंको नष्ट अथवा जलमें मिलाकर पानसे समस्त उदररोग, प्लीहा, प्रमेह करता हैं * ॥ २४ ॥ अर्श, कृमि और गुल्मरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥ पिप्पलाघृतम् । पिप्पल्यादिचूर्णम् । पिप्पलीकल्कसंयुक्तं घृतं क्षीरचतुर्गुणम् । पिप्पली नागरं दन्ती समांशं द्विगुणाभयम् । | पिबेत्प्लीहाग्निसादादियकृद्रोगहरं परम् ॥ २५॥ चूर्ण पीतं बिडार्धाशं प्लीहन्नं हृष्णवारिणा ॥ १८॥ छोटी पीपलका कल्क तथा चतुर्गुण दूधके साथ सिद्ध घृतको प्लीहा, आनिमांद्य, यकृत् आदिके नाशानार्थ पीना छोटी पीपल, सोंठ, तथा दन्ती प्रत्येक १ भाग, बड़ी| चाहिये ॥२५॥ । हर्रका छिल्का २ भाग, विडनमक आधाभाग सबका चूर्ण कर गरम जलके साथ पीनेसे प्लीहा नष्ट होती है ॥१८॥ चित्रकघृतम् । वर्द्धमानपिप्पलीयोगः। चित्रकस्य तुलाकाथे घृतप्रस्थं विपाचयेत् । आरनालं तद्विगुणं दधिमण्डं चतुर्गुणम् ।। २६ ।। क्रमवृद्धथा दशाहानि दशपिप्पलिकं दिनम् । वर्धयेत्पयसा साध तथैवापनयेत्पुनः ॥ १९॥ पञ्चकोलकतालीसक्षारैलवणसंयुतैः । जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा । द्विजीरकनिशायुग्ममरिचैः कल्कमावपेत् ॥ २७ ।। पिप्पलीनां प्रयोगोऽयं सहस्रस्य रसायनः ॥ १९ ॥ दशपिप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्तितः । ___ * लोकनाथरसः--शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्वे कुर्याच | कजलीम् । सूततुल्यं जारिताभ्रं सम्मर्य कन्यकाम्बुना ॥ गोलं यस्त्रिपिप्पलिपर्यन्तः प्रयोगः सोऽवरः स्मृतः॥२१॥ कुर्यात्ततो लौहं तानं च द्विगुणीकृतम् । काकमाचीरसैः पिष्ट्वा बृंहणं वृष्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम् । गोलं ताभ्यां च वेष्टयेत् ॥ वराटिकाया भस्माथ रसतस्त्रिगुणं वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीनां रसायनम् ॥२२॥ क्षिपेत् । ततश्च सम्पुटं कृत्वा मूषामध्ये प्रकल्पयेत् ॥ तन्मध्ये पञ्चपिप्पलिकश्चापि दृश्यते वर्धमानकः। गालकं कृत्वा शरावेण पिधापयेत् । पुटेगजपुटे विद्वान्स्वागशीतं पिष्टास्ता बलिभिः पेयाः शृता मव्यबलैनरैः। । | समुद्ध ॥ शिवं सम्पूज्य यत्नेन द्विजांश्च परितोषयेत् । खादेंशीतीकृता ह्रस्वबलदेंहदोषामयान्प्रति ॥ २३॥ द्रक्तिद्वयं चूर्ण मूत्रं चापि पिबेदनु ॥ मधुना पिप्पलीचूर्ण सगुड़ा म्बुहरीतकीम् । अजाजी वा गुड़ेनैव भक्षयेदस्य मानतः ॥ यकृ१०दिनतक क्रमशः प्रतिदिन १०पिप्पलियाको बढाते हए। द्गुल्मोदरप्लीहश्वयथुज्वरनाशनम् । वह्निमान्द्यप्रशमनं सर्वान्व्यादूधफे साथ सेवन करना चाहिये और इसी प्रकार कम करना। करनाधीनियच्छति ॥" शुद्ध पारद १ भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, चाहिये, औषध पच जानेपर साठीक चावलोंका भात दूध व दोनोंको घोटकर उत्तम कजली बनावे । फिर इस कज्जलीमें घीके साथ खाना चाहिये । इस प्रकार २० दिनमें १००० पारदके बराबर अभ्रक भस्म मिला घीकुमारके रससे घोटकर पिप्पलियां हो जाती हैं। यह "उत्तम" रसायन प्रयोग है। प्रति गोला बना लेवे । पुनः लौहभस्म तथा ताम्रभस्म प्रत्येक पार, दिन ६ पिप्पली बढ़ाना “ मध्यम" और प्रतिदिन ३ पिप्पली |दसे दुनी लेकर मकोयके रसमें घोटकर पूर्वोक्त गोलेके ऊपर बढ़ाना "निकृष्ट" कहा जाता है। यह 'वर्द्धमान पिप्पली' बंहण. लेप करे। फिर पारदसे त्रिगुण कौड़ीकी भस्म लेकर शरावसम्पुवृष्य आयुष्य, प्लीहा, उदरको नष्ट करनेवाली अवस्थाको टमें आधी भस्म नीचे, बीचमें गोला, आधीभस्म ऊपर रखकर स्थिर रखनेवाली तथा मध्य है । पञ्चपिप्पलीका भी वर्द्धमान दूसरे शरावसे बन्दकर कपड़ मिट्टीकर दे । फिर इसको गजपुटमें प्रयोग करते है । बलवान् पुरुषको पीसकर मध्यबलवालोंको | भस्म करे । स्वांगशीतल हो जानेपर निकाल ले । फिर घोटले । क्वाथकर तथा अल्पबलवालोंको शीतकषाय बनाकर पीना पुनः शंकरजीका पूजन कर तथा ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट कर इसकी चाहिये ॥ १९-२३॥ २ रत्तीकी मात्रा खावे, ऊपरसे गोमूत्र पीवे तथा इतना ही पिप्पलीचित्रकघृतम् । पीपलका चूर्ण शहदके साथ अथवा हरीतकी चूर्ण गुड़के शर्ब तके साथ अथवा जीरा गुड़के साथ खाना चाहिये । यह पिप्पलीचित्रकान्मूलं पिष्वा सम्यग्विपाचयेत् । यकृत् , गुल्म उदर, प्लीह, सूजन, ज्वर, अग्निमान्य आदि सर्व घृतं चतुर्गुणक्षीरं यकृत्प्लीहोदरापहम् ।। २४॥ रोगोंको नष्ट करता है ( यह रसप्रयोग कुछ पुस्तकोंमें ही छोटी पीपल व चीतकी जड़के कल्कमें चतुर्गुण दूध मिला- मिलता ह, अतः क्षेपक प्रतीत होता है)॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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