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________________ धिकारः] . भाषाटीकोतः। (१७७) पयसा सत्रिवृत्कल्केनोरवूकशृतेन वा। विविधा योगा। शातलानायमाणाभ्यां शृतेनारग्वधेन वा ॥ १७ ॥ मूत्राण्यष्टावुदरिणां सेके पाने च योजयेत् । पित्तोदरमें बलवान् पुरुषको पहिले ही विरेचन देना चाहिये। स्नुहीपयोभावितानां पिप्पलीनां पयोऽशनः ॥२४॥ निर्बलका अनुवासन कर तथा क्षीरबस्ति देकर निसोथके कल्कके सहस्रं च प्रयुजीत शक्तितो जठरामयी। साथ दूधसे अथवा एरण्डके साथ औटे हुए दूधसे अथवा सातला शिलाजतूनां मूत्राणां गुग्गुलोस्वैफलस्य च ॥२५॥ (सेहुण्डभेद ) व त्रायमाणासे सिद्ध दूधसे अथवा अमलताससे सिद्ध दूधसे विरेचन देना चाहिये ॥ १६ ॥१७॥ स्नुहीक्षीरप्रयोगश्च शमयत्युदरामयम् । स्नुक्पयसा परिभावितवण्डुलचूर्णैर्विनिर्मितः पूपः२६ कफोदरचिकित्सा। उदरमुदारं हिंस्याद्योगोऽयं सप्तरात्रेण । कफादुदरिणं शुद्धं कटुक्षारान्नभोजितम् । पिप्पलीवर्धमानं वा कल्पदृष्टं प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥ जठराणां विनाशाय नास्ति तेन समं भुवि । मूत्रारिष्टायस्कृतिभिर्योजयेच्च कफापहैः ॥१८॥ । उदरवालोंको सिञ्चन तथा पानके लिये आठों मत्रोंका प्रयोग कफोदरवालेको कटु, क्षार अन्न भोजन कराके शुद्ध कर करना चाहिये । तथा दूधका सेवन करते हुए सेहुण्डके दूधसे गोमूत्र, अरिष्ट तथा लौहभस्म आदि कफनाशक प्रयोगोंसे युक्त | भावित १००० पिप्पलियोंका प्रयोग शक्तिके अनुसार करना करना चाहिये ॥१८॥ चाहिये । अथवा शिलाजतु, मूत्र अथवा त्रिफला, गुग्गुलु, सन्निपातायुदरचिकित्सा। अथवा थूहरके दूधका प्रयोग उदररोगको शान्त करता है। | इसी प्रकार थूहरके दूधसे भावित चावलके आटेकी पुडी ७ सन्निपातोदरे सर्वा यथोक्तां कारयेक्रियाम् । दिनमें बढे हुए उदररोगको नष्ट करती है। अथवा कल्पोक वर्द्धप्लीहोदरे प्लीहहरं कर्मोदरहरं तथा ॥ १९॥ मान पिप्पलीका प्रयोग करना चाहिये। इससे बढ़कर उदररोगोंक स्विन्नाय बद्धोदरिणे मूत्रं तीक्ष्णौषधान्वितम् । नाशार्थ कोई प्रयोग नहीं है ॥ २४-२७ ॥ सतैलं लवणं दद्यान्निरूह सानुवासनम् ॥ २० ॥ पटोलाद्यं चूर्णम् । परिस्रंसीनि चान्नानि तीक्ष्णं चैव विरेचनम् । पटोलमूलं रजनी विडङ्गं त्रिफलात्वचम् ॥ २८॥ छिद्रोदरमृते स्वेदाच्छेष्मोदरवदाचरेत् ॥२१॥ कम्पिल्लकं नीलिनी च त्रिवृतां चेति चूर्णयेत् । जातं जातं जलं स्राव्यं शास्त्रोक्तं शस्त्रकर्म च । षडाद्यान्कार्षिकानन्त्यांस्त्रींश्च द्वित्रिचतुर्गुणान् ॥२९ जलोदरे विशेषेण द्रवसेवां विवर्जयेत् ॥ २२ ॥ कृत्वा चूर्ण ततो मुष्टिं गवां मूत्रेण ना पिबेत् । सन्निपातोदरमें सभी चिकित्सा करनी चाहिये । प्लीहोदरमें विरिक्तो जाङ्गलरसैर्भुजीत मृदुमोदनम् ॥ ३०॥ प्लीहानाशक तथा उदरनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । बद्धो-| मण्डं पेयां च पीत्वा च सव्योष षडहः पयः । दरमें स्वेदनकर तीक्ष्णौषधयुक्त मूत्र तथा तैल व लवणयुक्त शृतं पिबेत्तु तच्चूर्ण पिबेदेवं पुनः पुनः॥ ३१॥ अनुवासन व आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । दस्त लानेवाले हन्ति सोंदराण्येतच्चूर्ण जातोदकान्यपि। अन्न तथा तीक्ष्ण विरेचन देना चाहिये । छिद्रोदरमें स्वेदके कामलां पाण्डुरोगं च श्वयर्थं चापकर्षति ॥ ३२॥ सिवाय शेष सब कफोदरकी चिकित्सा करनी चाहिये । जलोदरमें उत्पन्न जलको निकालना चाहिये तथा शास्त्रोक्त शस्त्र परवलकी जड़ १ तोला, हल्दी १ तोला, वायविडङ्ग १ तो, कर्म करना चाहिये । इसमें जलीय द्रव्योंको न खाना | आंवला १ तो०, हरे १ तो०, बहेड़ा १ तो०, कवीला २ तो०, चाहिये ॥ १९-२२॥ नीलकी पत्तियां ३ तो०, निसोथ ४ तो०, सबका चूर्ण कर ४ तोलाकी मात्रा गोमूत्रमें मिलाकर पीना चाहिये, इससे विरेचन लेपः। होगा। दस्त आजानेके अनन्तर जांगल प्राणियोंके मांसरससे हल्का भात खाना चाहिये । अथवा मांड, पेया, विलेपी अथवा देवदारुपलाशार्कहस्तिपिप्पलिशिकैः। त्रिकटुसे सिद्ध दूध ६ दिनतक पीना चाहिये । ७ वें दिन साश्वगन्धैः सगोमूत्रैः प्रदिह्यादुदरं शनैः ।। २३ ॥ यही चूर्ण फिर गोमूत्रके साथ पीना चाहिये । इस तरह बारबार देवदारु, ढाकके बीज, आककी जड़, गजपीपल, सहिजनकी छाल, असगन्ध इनको गोमूत्रमें पीसकर धीरे धीरे पेटपर लेप । १. सैरिभाजाविकरभागोखरद्विपवाजिनाम् । करना चाहिये ॥२३॥ मूत्राणीति भिषग्वर्यैर्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥"
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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