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________________ (१५८) चक्रदत्तः। [हृद्रोगानन्न्नन्न्न्न न्न् ८ तो०) में पकाना चाहिये, चतुर्थांश शेष रहनेपर छोटी पीपल, क्षारयुक्त मांस (या तिल कल्क ) अथवा थूहरके दूधके सहित चीतकी जड़ और शहदसे लिपे घड़ेमें रखना चाहिये तथा शहद मांसपिण्ड योनिमें धारण करे और रक्तके अधिक बहनेपर रक्त. १२८ तो० और हरड़ोंका चूर्ण ३२ तोला मिलाकर १० दिनतक | पित्तनाशक चिकित्सा करे ॥ ९६-९८ ॥ बुसके अन्दर रखना चाहिये फिर निकाल छानकर अन्न हजम भल्लातकघृतम् । होनेके बाद पीना चाहिये । यह अरिष्ट गुल्म और मन्दाग्निको | नष्ट करता है ॥ ९०-९२ ॥ भल्लातकात्कल्ककषायपक्वं सर्पिः पिबेच्छकरया विमिश्रम् । रक्तगुल्मचिकित्सा। तद्रक्तपित्तं विनिहन्ति पीतं बलासगुल्मं मधुना समेतम् ।। ९९ ॥ रोधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे । भिलावेक कल्क और क्वाथसे पकाया गया घृत शकरके साथ स्निग्धस्विन्नशरीरायै दद्यास्निग्धं विरेचनम् ॥९३॥ पीनेसे रक्तपित्त और शहदके साथ पीनेसे कफगुल्मको नष्ट करता रक्तगुल्मकी चिकित्सा गर्भकाल व्यतीत हो जानेपर ही|ह ॥९॥ करनी चाहिये । उस समय नेहन स्वेदन कर निग्ध विरेचन अपथ्यम्। देना चाहिये ॥१३॥ बल्लूरं मूलकं मत्स्याञ्शुष्कशाकानि वैदलम् । . न खादेचालुकं गुल्मी मधुराणि फलानि च ॥१०॥ शताबादिकल्कः। सूखा मांस, मूली, मछली, सूखे शाक, दाल, आलू और शताहाचिरबिल्वत्वग्दारुभाङ्गीकणोद्भवः। मीठे फल गुल्मवालेको नहीं खाने चाहिये ॥ १० ॥ कल्कः पीतो हरेद् गुल्मं तिलक्वाथेन रक्तजम् ॥९४| इति गुल्माधिकारः समाप्तः। सौंफ, कजाकी छाल, देवदारु, भारंगी तथा छोटी पीपलका कल्क तिलके काढ़ेके साथ पीनेसे रक्तगुल्म नष्ट | अथ हृद्रोगाधिकारः। होता है ॥ ९४ ॥ तिलक्वाथः। वातजहृद्रोगचिकित्सा। तिलक्काथो गुडव्योषहिंगुभाीयुतो भवेत् । । वातोपसृष्टे हृदये वामयेस्निग्धमातुरम् । पानं रक्तभवे गुल्मे नष्टपुष्पे च योषिताम् ॥ ९५ ॥ द्विपञ्चमूलीकाथेन सस्नेहलवणेन च ॥१॥ तिलका क्वाथ, गुड़, त्रिकटु, भुनी हींग तथा भारंगीका. वातहृदोगयुक्त पुरुषको स्निग्ध कर दशमूलके क्वाथमें स्नेह, नमक और वमनकारक द्रव्य मिलाकर वमन कराना चूर्ण मिलाकर रक्तगुल्म तथा मासिकधर्म न होनेपर देना। चाहिये ॥२॥ चाहिये ॥९५॥ पिप्पल्यादिचूर्णम् । विविधा योगाः। पिप्पल्येलावचाहिगुयवक्षारोऽथ सैन्धवम् । सक्षारत्र्यूषणं मद्य प्रपिबेदस्रगुल्मिनी। सौवर्चलमथो शुण्ठीमजमोदावचूर्णितम् ॥ २ ॥ पलाशक्षारतोयेन सिद्धं सर्पिः पिबेच्च सा ॥ ९६ ॥ फलधान्याम्लकोलत्थदधिमद्यासवादिभिः । उष्णैर्वा भेदयेद्भिन्ने विधिरासृग्दरो हितः। पाययेच्छुद्धदेहं च स्नेहेनान्यतमेन वा ॥ ३ ॥ न प्रभिद्येत यद्येवं दद्याद्योनिविशोधनम् ॥ ९७॥ छोटी पीपल, बड़ी इलायची, वच, भुनी हींग, यवाखार, क्षारेण युक्तं पलल सुधाक्षीरेण वा पुनः। | सेंधानमक, कालानमक, सोंठ, तथा अजवाइन सब समान भाग रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु रक्तपित्तहरी क्रिया ॥९८॥ १ कुछ पुस्तकोंमें “ पलल" शब्दका ऐसा विवरण है किरक्तगुल्मिनी यवाखार व त्रिकटुके सहित मद्य पीवे । अथवा पलाशक्षारके साथ पलल ( तिलचूर्ण) को मिला कर जलके पलाशके क्षार जलसे सिद्ध घृत पीवे । अथवा गरम प्रयोगोंसे | साथ घे टकर बर्तिका बना ले । अथवा पलाश क्षार तथा गुल्मको फोडना चाहिये, फिर रक्तप्रदरकी चिकित्सा करनी तिलकल्कको थोहरके साथ घोटकर बर्तिका बना ले।(इस बर्तिचाहिये । यदि इस प्रकार न फूटे तो योनिविशोधनके लिये | काको योनिमें रखनेस योनि विशुद्ध हो जाती है)।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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