SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 21
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ माँ सरस्वती ११ श्री सम्यग्ज्ञानोपासना विभाग ४४ हजार और ५९१ मनः पर्यवज्ञानी मुनि भगवंत थे । ५) केवलज्ञान-लोक- अलोक में रहे हुए सभी रूपी अरूपी पदार्थों का एक ही साथ त्रिकाल (भूत- भावि - वर्तमान) ज्ञान होता है, उसे केवलज्ञान कहते है । इसका एक ही भेद है । सभी ज्ञानों में अंतिम ज्ञान केवल ज्ञान ही श्रेष्ठतम है । ८ कर्मो में से जब ४ घाति कर्म- १) ज्ञानावरणीय कर्म, २) दर्शनावरणीय कर्म, ३) मोहनीय कर्म और ४) अंतराय कर्म का संपूर्ण सर्वथा क्षय (नाश) होता है, तभी केवलज्ञान प्रगट होता है । केवल ज्ञान होने के बाद ही हम मोक्ष में जा सकते है । आत्मा का उत्थान करानेवाले पाँचों सम्यग्ज्ञान को हमारी अक्षय अनंत वंदना... .! ज्ञानवर्धक सूचनाए - इतना अवश्य पढे... क्या आपको ज्ञान नहीं चढता ? याद नहीं रहता ? सब कुछ भूल जाते हो ? बार-बार फेल हो रहे हो ? बुद्धि ओर तीक्ष्ण एवं तेज बनानी है ? परिक्षामें अच्छे अंक (मार्कस) से पास होना है ? शास्त्र और सद्धर्म का सार प्राप्त करना है ? तो फिर, आपको इतने नियमों का पूरा पालन करना ही होगा । जिस तरह दवाई के साथ परेजी उतनी ही जरुरी होती है, वैसे ही ज्ञान आराधना एवं सरस्वती साधना के साथ निम्नलिखित नियमों का पालन करने से ही ज्ञान-प्राप्ति होना संभव है, वरना नहीं । नियमावली १) सरस्वती माता को प्रसन्न करने हेतू सर्व प्रथम अपने (माता) मम्मी को खुश करें । माता-पिता की बाते जरुर सुने । उनका कभी भी अपमान न करें । २) माता-पिता एवं बुजुर्गों (अपने से बड़ों) को नित्य नमन करें । ३) बड़ों को कभी भी उल्टा जवाब न देवे । ४) कभी झुठ न बोलें एवं चोरी न करें । ५) रोज कम से कम एक घंटा मौन रखें । ६) अक्षरवाले एवं पशु-पक्षी और मानव के चित्रवाले कपडे कभी न पहनें ।
SR No.032027
Book TitleSamyag Gyanopasna Evam Sarasvati Sadhna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHarshsagarsuri
PublisherDevendrabdhi Prakashan
Publication Year2007
Total Pages122
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy