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________________ (co) परिन्दात्मक परिणाम बराबर होता है । क्रियाका लक्षण देशात देशान्तर प्राप्ति है जो कि आपके ईश्वर में एक रम सर्व व्यापी होने के कारण असम्भव है । यदि ईश्वर में चम्ब के आर्ष की भांति क्रिया स्वाभाविक है तो जिस प्रकार चुम्बक मदैव लोहे को अपनी ओर कांता है उसी प्रकार पमाओं के भी सदेव से होने के काया : ईश्वर उसमें अपने खभावसे सदैव क्रिया देता रहता होगा और उनका फल सृष्टि सदैव से होगी । जब ऐसा है तब प्रलय कैसे होती है क्योंकि वेदान्त के "नेक मित्रसम्भवात्" सूत्र के अनुसार ईश्वरकी : स्वाभाविक क्रिया में सृष्टि कर्तृत्व और प्रज्ञय कर्तृत्व के दो बिरोधी गुण नहीं रह सकते । सृष्टिके सब कार्य्य नियम पूर्वक नहीं-होते क्योंकि “गधः सुत्रर्णे फनभिक्षु इण्डे नाकारि पुष्पं खलु चन्दनेषु । विद्वान् धनाढ्यो न तु दीर्घ धातुः पुरा कोपि न वुद्धिदोऽभूत् ॥” कहीं वर्षा कितने ही दिन होती है कहीं कितने ही दिन और जब उसकी आवश्यकता होती है तब वह कभी नहीं होतीं और कभी कभी विना श्रावश्यकता ही इत्यादि अनेक अ * साइन्सके सुप्रसिद्ध विद्वान् भूत पूर्व मिष्टर जे० क्लर्क मैक्सवेल एम० ए० एल एल० डी०, एफ० आर० एम एम० एल० एण्ड ई० झानरेरी फेलो यांत्रटिनिटी कालेज और प्रोफेवर आाव एक्मपेरीमेण्टल फिज़िक्स इन दो यूनिवर्सिटी आव कैम्ब्रिज अपनी मैनुअल्प याव एलीमेन्टरी साइन्स सोरीज़ "मैटर एण्ड मोशन” नामक पुस्त में न्यूटन की थर्डला खाव मोशन (क्रि. या के तीसरे नियम ) की सिद्धिमें पृष्ठ ४८ लिखते हैं किः The fact that a magnet draws iron towards it was noticed by the ancients, but no attention was paid to the force with which the iron attructs the magnet अर्थात् यह विषय कि चुम्बकं लोहेको अ -पनी ओर खींचता है पूर्व पुरुषोंसे जाना गया था परन्तु उस शक्ति पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था जिसके द्वारा लोहा चुम्बकको अपनी ओर खींचता है। अतः माहन्त द्वारा यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है कि चुम्बकमें भी परिस्पन्दात्मक क्रिया और अपरिस्पन्दात्मक परिणाम या अपरिस्पन्दात्मक प रिणाम बरावर होता रहता है इस कारण स्वामी जोका यह मानना कि "चुम्बक पत्थर स्वयं नहीं हिलता, परन्तु लोहे को हिला देता है ठीक नहीं वरन् वादिगजके मरीजो का चुम्बन में क्रियां मागंना विल्कुल यथार्थ है क्योंकि यदि ऐसा न होता तो छोटा चुम्बक बड़े लोहे से कैसे खिंचता । ( प्रकाशक )
SR No.032024
Book TitlePurn Vivaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Tattva Prakashini Sabha
PublisherJain Tattva Prakashini Sabha
Publication Year1912
Total Pages128
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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