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________________ 178 મી જૈન હિતાપદેશ ભાગ 3 છે 16. जे उत्तम पुरुषे आपणने उपगार को होय तेनी सामा थइ तेने नुकशान करवानी अगर तेनुं बुरु बोलवानी प्रवृत्ति स्वार्थने खातर अगर प्राणांत कष्ट आवे छते पण करवी नहि. 17. कोइए करेला अपराधथी गुस्से थइ तेनो अनादर करखाने बदले शांतिथी तेनुं खलं स्वरूप स. मजावी ठेकाणे पाडवामांज सार छे... 18. द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भावने लक्षमां राखीने उचित प्रवृत्ति करतां नम्रता धारण करशे, तेज भव्यजनो स्वपर हितने साधवा समर्थ थइ शकशे. रागद्वेष अने मोहने सर्वथा तजी सर्वज्ञ सर्वदशा थइ आपणने पण एवाज-निर्मळ निर्दोष थवा जिनेश्वर भगवान उपदिशे छे. उक्त सूचना मुजब वर्तवा सकळ उपदेशक मुनिमंडळ तथा अन्य उत्साही श्रावक वर्ग खरा जीगरथी प्रयत्न करे तो सारो अने संगीन लाभ खल्प समयमां थवो संभवे छे. सुज्ञेषु किंबहुना, समाप्त.
SR No.023521
Book TitleJain Hitopadesh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKarpurvijay
PublisherJain Shreyaskar Mandal
Publication Year1909
Total Pages352
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size17 MB
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