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________________ उपोद् उपोद्घात. घात. श्रा महापुरुषे कया कया विषयना केटला ग्रंथो खख्या वे ते संबंधमा हजुसुधी चोकस निर्णय थयो नयी. तेमना|| पीना सैकामां थयेखी न्यायविद्याना श्रन्यासनी हानिने सीधे फक्त कोइ कोई जगोपर तेमना ग्रंथो उपलब्ध थाय | ने, तेमां केटसाक ग्रंथो तेजेश्रीना हस्ताक्षरना पण मळे जे आने केटवाक ग्रंथो खहीआए जेम तेम उतारेला अने| त्यार पड़ी श्रन्यासमां नहि वपरायेखा होवाथी कोइ पण प्रकारना संस्कार वगरना मळे बे. आम होवाथी श्रा ग्रंथमाळा उपावतां घणा ग्रंथोमा एक एक प्रत उपर पण श्राधार राखी काम खेवं पङयु जे. उपर जपावेलां कारणोथी बनती| महेनते सुधारो करतां बता पण अशुद्ध खागता पागेने स्थले काँसमा शुद्ध तरीके खागतां पद दाखल करवामां आव्यां जे. जे महाशयोने या ग्रंथमाळा वांचतां जे जे अशुद्धि लागे ते अमने खखी जपाववानो अमे श्राग्रह करीए बीए के जेथी बीजी श्रावृत्ति वखते अथवा तेनी पहेला पण पुस्तक खेनारन खीस्ट राखेख होवाथी तेना ग्राहकने शुद्धिपत्रक मोकलावी सुधारो करवानी गोठवण करवानो प्रसंग मळी शके. | तेश्रीना बनावेला उपलब्ध ग्रंथोमांथी नाना अने उपयोगी ग्रंथोनो एक समुदाय श्रा ग्रंथमालामां प्रगट करवानोHI ॥ हेतु ते सर्वने एक साथे जाळवी राखी तेनी उपयोगितामां वधारो करवानो के. या ग्रंथमाळामां नीचेना ग्रंथो प्रकट|| काकरवामां श्राव्या .
SR No.023511
Book TitleNyayacharya Yashovijayji Krut Granthmala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Dharm Prasarak Sabha
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1909
Total Pages364
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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