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________________ कुवलयानन्दः अत्र चन्द्रमध्ये मन्थनकालिकमन्दरशिलासंघट्टनवणकिणस्यैव छायादीनां संभवो नास्तीति छायात्वाद्यपह्नवः पामरवचनत्वोपन्यासेनाविष्कृतः ।। २७ ।। अन्यत्र तस्यारोपार्थः पर्यस्तापह्नुतिस्तु सः। नायं सुधांशुः, किं तर्हि ? सुधांशुः प्रेयसीमुखम् ॥ २८॥ यत्र कचिद्वस्तुनि तदीयधर्मनिह्नवः, अन्यत्र वर्णनीये वस्तुनि तस्य धर्मस्यारोपार्थः स पर्यस्तापह्नतिः । यथा चन्द्रे चन्द्रत्वनिह्नवो वर्णनीये मुखे तदारोपार्थः । यथा वा हालाहलो नैव विषं, विषं रमा, जनाः परं व्यत्ययमत्र मन्वते | निपीय जागर्ति सुखेन तं शिवः, स्पृशनिमां मुह्यति निद्रया हरिः ।। पूर्वोदाहरणे हेतूक्तिर्नास्ति, अत्र तु सास्तीति विशेषः । ततश्च पूर्वापह्नतिवदत्रापि द्वैविध्यमपि द्रष्टव्यम् ।। २६ ॥ ___ यहाँ पृथ्वी की छाया, हिरन या खरगोश वाले मतों को पामरवचन बताकर कवि ने छायादि का निषेध किया है, छायादि की तो वहाँ सम्भावना ही नहीं हो सकती तथा इस बात की पुष्टि की है कि चन्द्रमा के बीच में जो काला धब्बा है, वह समुद्रमन्थन के समय मंदराचल की शिलाओं से टकराने से पैदा हुए घाव का चिह्न ही है। २८-जहाँ वस्तु के धर्म का निषेध कर साथ ही साथ उस धर्म का आरोप अन्य वस्तु पर किया जाय, वहाँ पर्यस्तापह्नति होती है। जैसे यह (दृश्यमान चन्द्रमा) सुधांशु नहीं है। तो फिर सुधांशु कौन है ? सुधांशु तो प्रिया का मुख है। ___ यहाँ चन्द्रमा (सुधांशु) के 'सुधांशुत्व' धर्म का उसमें निषेधकर उसका आरोप रमणीवदन पर कर दिया गया है, अतः यहाँ पर्यस्तापह्नति है। जहाँ किसी वस्तु के अन्दर उसके धर्म का निषेध इस लिए किया जाय कि अन्य वर्ण्य वस्तु पर उसका आरोप हो सके उसे पर्यस्तापहृति कहते हैं। जैसे चन्द्रमा में चन्द्रत्व का निषेध वर्ण्य विषय 'प्रियामुख' में उसके आरोप करने के लिए किया गया है। __ इसी का दूसरा उदाहरण यह है: लोग जहर को जहर समझते हैं । वस्तुतः हालाहल (जहर) विष नहीं है, यदि कोई जहर है तो वह लक्ष्मी है । लोग भ्रांति से यहाँ हालाहल में विषत्व मान बैठते हैं। भगवान् शंकर हालाहल को पीकर भी जगते रहते हैं, अतः सिद्ध है कि उसमें विषत्व नहीं है (नहीं तो वह उन्हें मोहाविष्ट करता), जब कि भगवान् विष्णु लक्ष्मी का स्पर्श करते ही नींद से मोहित हो जाते हैं । अतः स्पष्ट है कि विषत्व लक्ष्मी में ही है। पर्यस्तापह्नति के कारिकाध के उदाहरण तथा इस उदाहरण में यह भेद है कि उसमें हेतु का उपन्यास नहीं किया गया है, जबकि यहाँ लक्ष्मी पर विषत्व का आरोप करने तथा हालाहल में विषत्व का निषेध करने का हेतु भी दिया गया है। इस प्रकार पहली अपह्नति की तरह यह भी निर्हेतुक तथा सहेतुक दो तरह की हो जाती है। टिप्पणी-मम्मट तथा जगन्नाथ पण्डितराज पर्यस्तापह्नति को अपह्नति का भेद नहीं मानते । जगन्नाथ पण्डितराज के मत से यह रूपक अलंकार का ही क्षेत्र है। ___अत्र 'चिन्त्यते-नायमपह्नतेर्भेदो वक्तं युक्तः, अपह्नतिसामान्यलक्षणानाक्रान्तत्वात् ।' तस्मात् 'नायं सुधांशुः किं तर्हि सुधांशुः प्रेयसीमुखम्' इत्यत्र दृढारोपं रूपकमेव भवितुमहति, नापह्नतिः। ( रसगंगाधर पृ० ३६८-९)
SR No.023504
Book TitleKuvayalanand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBholashankar Vyas
PublisherChowkhamba Vidyabhawan
Publication Year1989
Total Pages394
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size32 MB
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