SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 450
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २२१ ) गमेरई - अइच्छा णुवज्जावज्जसोक्कु साकुस-पचड - पच्छन्द- णिम्मह-णी - णी णीलक्क - पदअ रम्भ-परिअक्ल बोल-परिअलणिरिणास विहावसेद्दावहराः ॥ १६२ ॥ गमेरेते एकविंशतिरादेशा वा भवन्ति ॥ गम् धातुने अई, अइच्छ, अणुवज, भवज्जस, उक्कुस, अक्कुम, प. चडू, पच्छन्द, णिम्मह, णी णीण, णीलुक्क, पदभ, रम्भ, परिअल, वोल, परिअल, णिरिणास, णिवह, भवसेह भने अवहर मेरा मेम्वीस माहेश विहये थाय छे. अईइ । अइच्छइ । अणुवज्जइ । भवज्जसइ । उक्कुसइ अक्कुसइ । पज्जड्डुइ । पच्छन्दइ । णिम्महइ । णीइ । णीणइ । णीलुकह पदभइ । रम्भइ । परिअलइ । वोलइ । परिअलइ । णिरिणासह । विहइ । अवसेहइ । अत्रहरई । पक्षे । गच्छइ ॥ हम्मद्द | णिहम्मद्द | णीहम्म | भहम्मद्द | पहम्मद इत्येते तु हम्म गतावित्यस्यैव भबि. व्यन्ति ॥ ॥ १६३ ॥ आङा अहिपच्चुअः ॥ आङा सहितस्य गमेः अहिपच्चुअ इत्यादेशो वा भवति ॥ आ-गमूने !!!! अहिपच्चुअ ोवे। महेश विम्ध्ये थाय छे. अहिपच्चुअद्द | पक्षे । भागच्छइ ॥ ॥ १६४ ॥ समा अभिः ॥ समा युक्तस्य गमेः अभिड इत्यादेशो वा भवति ॥ सम्-गम्ने अब्भिड भेवे। महेश विश्ये थायछे अम्भिद्दा संगच्छद्द॥
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy